🚍 Quick Highlights
- इंदौर (कुमेर्डी, MR-10) में 110 करोड़ रुपये की लागत से बने इंटर स्टेट बस टर्मिनल का संचालन शुरू नहीं हो पा रहा है।
- अभी तक कोई ठेकेदार नहीं मिल पाया है, जिससे टर्मिनल पूरा बनकर भी खाली पड़ा हुआ है।
- प्राधिकरण अब पांचवीं बार टेंडर निकालने की तैयारी कर रहा है, नियम-शर्तों में बदलाव के साथ।
- सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन के मद्देनज़र टर्मिनल को उज्जैन-भोपाल सहित दूसरे शहरों को जोड़ने के लिए इस्तेमाल करने की योजना है।
🧠 360 विश्लेषण
इंदौर के कुमेर्डी इलाके में बनकर तैयार हुआ 110 करोड़ रुपये का इंटर स्टेट बस टर्मिनल अब तक प्रभावी रूप से शुरू नहीं हो पाया है, क्योंकि प्राधिकरण प्रचालन-संधारण का ठेका देने में असफल रहा है।
टर्मिनल की मांग और क्षमता काफी बड़ी है — इसमें लगभग 1400 बसों तक की क्षमता और एयरपोर्ट जैसे आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं — लेकिन फिर भी संचालन के लिए कोई उपयुक्त फर्म चार बार के टेंडर में नहीं मिली।
इसका मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि बस टर्मिनल के निर्देशों और टेंडर शर्तों में कुछ अस्पष्टता या जटिलता है, जिसकी वजह से कंपनियां इस पर बोली लगाने में आनाकानी कर रही हैं। अब प्राधिकरण नियमों में संशोधन करके पांचवी बार टेंडर लेने की तैयारी कर रहा है, ताकि एक योग्य कंपनी को टर्मिनल का संचालन सौंपा जा सके।
विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि यह टर्मिनल केवल स्थानीय परिवहन के लिए ही नहीं, बल्कि उज्जैन-भोपाल और अन्य प्रमुख शहरों के लिए रूट विस्तार का केंद्र बनने की क्षमता रखता है। सिंहस्थ जैसे बड़े कार्यक्रम के चलते इसका सही समय पर संचालन होना यात्रियों के लिए सुविधाजनक साबित हो सकता है।
लेकिन फिलहाल यह बड़ा फैसिलिटी खाली पड़ा हुआ है, और प्राधिकरण चाहता है कि जिस कंपनी को यह टर्मिनल सौंपा जाए, वह रोडवेज जैसी परिवहन सेवा भी उसी कंपनी के अधीन रखे।
सरकारी योजना और योजनाबद्ध खर्च के लिहाज से 110 करोड़ रुपये का निवेश बेहद बड़ा है, इसलिए इसका बेकार पड़ना ना सिर्फ आर्थिक बोझ बनता है बल्कि शहर की यात्री सुविधा योजनाओं पर भी सवाल खड़ा करता है।
🧾 निष्कर्ष
इंदौर में बने 110 करोड़ रुपए के इंटरस्टेट बस टर्मिनल का उद्देश्य तो यात्रियों को बेहतर सुविधा देना था, लेकिन ठेकेदार न मिलने के कारण यह अब तक बेकार पड़ा है। प्राधिकरण ने नियम-शर्तों में संशोधन कर 5वीं बार टेंडर निकालने का निर्णय लिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार एक उपयुक्त कंपनी मिल पाएगी और टर्मिनल का संचालन शुरू हो सकेगा या नहीं।
लंबे समय से बंद पड़े ऐसे परियोजनाओं को समय पर चलाना ही शहर और यात्री दोनों की भलाई में सहायक होता है।
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