🔴 Quick Highlights
- धार की भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद पर ASI की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट सामने
- दावा: संरचना में प्राचीन मंदिरों के हिस्सों का इस्तेमाल
- GPR और पुरातात्विक जांच के आधार पर निष्कर्ष
- दोनों समुदायों के बीच विवाद और कानूनी लड़ाई तेज
- मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन
🧠 360 विश्लेषण
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद परिसर लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है। यह स्थल हिंदुओं के लिए माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर माना जाता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे मस्जिद मानता है। धार भोजशाला विवाद ऐतिहासिक, धार्मिक और कानूनी — तीनों स्तर पर चल रहा है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहां वैज्ञानिक सर्वे कराया था। इस सर्वे में ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक सहित कई आधुनिक तरीकों का उपयोग किया गया ताकि जमीन के नीचे की संरचना और पुरातात्विक अवशेषों का पता लगाया जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में मौजूद वर्तमान ढांचे में प्राचीन मंदिरों के स्तंभ, शिल्प और वास्तु अवयव इस्तेमाल किए गए हैं। ASI ने यह निष्कर्ष वास्तु अवशेषों, मूर्तियों, शिलालेखों और उत्खनन से मिले प्रमाणों के अध्ययन के आधार पर निकाला।
इतिहासकारों के अनुसार, यह परिसर मूल रूप से 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र था, जिसे बाद में मुस्लिम शासन के दौरान मस्जिद में परिवर्तित किया गया।
हालांकि मुस्लिम पक्ष ने इन निष्कर्षों को चुनौती देते हुए कहा है कि मंदिर के अवशेष वास्तव में राजा भोज के महल के खंडहरों से लाए गए हो सकते हैं, न कि मंदिर से। उन्होंने रिपोर्ट को अदालत में चुनौती देने की बात कही है।
यह स्थल फिलहाल ASI के नियंत्रण में है और विशेष व्यवस्था के तहत यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को अलग-अलग दिनों में पूजा और नमाज की अनुमति दी जाती है — जो अपने-आप में इस विवाद की जटिलता दिखाता है।
⚖️ निष्कर्ष
भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद केवल इतिहास का सवाल नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा मुद्दा है।
👉 ASI रिपोर्ट ने विवाद को खत्म नहीं किया
👉 बल्कि नई बहस और कानूनी संघर्ष की शुरुआत कर दी
अब अंतिम फैसला अदालत और आगे की जांच पर निर्भर करेगा कि इस स्थल का ऐतिहासिक चरित्र क्या माना जाएगा।

