Quick Highlights

  • दिल्ली में बढ़ता वायु प्रदूषण ( delhi air pollution ) फिर चर्चा में
  • चीन ने बीजिंग के अनुभव के आधार पर स्टेप-बाय-स्टेप समाधान गिनाए
  • वाहन उत्सर्जन, इंडस्ट्री शिफ्ट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जोर
  • सवाल यह नहीं कि उपाय क्या हैं, सवाल है कि क्या हम लागू करेंगे?

360 विश्लेषण

दिल्ली की हवा हर साल सर्दियों में वही कहानी दोहराती है—सांस लेना मुश्किल, आंखों में जलन और AQI ऐसा कि मोबाइल ऐप भी डर जाए। इसी बीच चीन की ओर से एक बयान सामने आया, जिसमें बीजिंग के पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए यह बताया गया कि कैसे एक समय “स्मॉग कैपिटल” कहलाने वाला शहर आज अपेक्षाकृत बेहतर हवा में सांस ले रहा है।

बीजिंग भी कभी ठीक वैसी ही स्थिति से जूझ रहा था, जैसी आज दिल्ली झेल रही है। वहां PM2.5 स्तर खतरनाक हद तक पहुंच चुका था। लेकिन चीन ने समस्या को अस्थायी नहीं, बल्कि लंबी लड़ाई मानकर कदम उठाए। सबसे पहले पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को चरणबद्ध तरीके से सड़कों से हटाया गया। सख्त उत्सर्जन मानक लागू किए गए और निजी वाहनों की संख्या नियंत्रित करने के लिए लाइसेंस प्लेट आधारित नियम अपनाए गए।

इसके साथ ही बीजिंग में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूती दी गई। मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हुआ, इलेक्ट्रिक बसें और इलेक्ट्रिक गाड़ियां बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतारी गईं। निजी वाहन चलाना आसान नहीं रखा गया, ताकि लोग मजबूरी में नहीं, समझदारी से सार्वजनिक परिवहन चुनें।

सबसे बड़ा और कड़ा फैसला इंडस्ट्री को लेकर हुआ। हजारों प्रदूषणकारी फैक्ट्रियों को या तो बंद किया गया या शहर से बाहर शिफ्ट कर दिया गया। भारी उद्योगों को रिहायशी इलाकों से दूर ले जाना आसान फैसला नहीं था, लेकिन असरदार जरूर साबित हुआ। इसके अलावा, बीजिंग अकेला नहीं लड़ा—आसपास के इलाकों को भी उसी प्लान में शामिल किया गया, क्योंकि हवा शहर की सीमा देखकर नहीं रुकती।

दिल्ली के संदर्भ में विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या उपायों की कमी नहीं है। यहां भी ऑड-ईवन, ग्रैप, निर्माण कार्य पर रोक और पटाखों पर पाबंदी जैसे कदम उठते रहे हैं। लेकिन ये ज़्यादातर सीज़नल और रिएक्टिव होते हैं। जैसे ही हालात थोड़े सुधरते हैं, सिस्टम फिर ढीला पड़ जाता है।

बीजिंग मॉडल यह सिखाता है कि प्रदूषण पर काबू पाने के लिए आधे-अधूरे फैसले नहीं, बल्कि सालों तक लगातार लागू होने वाली नीति चाहिए। सवाल बस इतना है—क्या हम उतना सख्त होना चाहते हैं, जितना ज़रूरी है?

निष्कर्ष

चीन की तरफ से दिया गया उदाहरण कोई ताना नहीं, बल्कि एक अनुभव साझा करने जैसा है। बीजिंग ने दिखाया कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो और फैसले लंबे समय के लिए लिए जाएं, तो हालात बदले जा सकते हैं। दिल्ली के लिए चुनौती यह नहीं है कि क्या करना है, असली चुनौती है—कब और कितनी ईमानदारी से करना है।

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