मध्य प्रदेश के छात्रों के लिए एक बड़ी खुशखबरी आई है। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी पढ़ाई, केवल अंग्रेजी तक सीमित न रहे, बल्कि हिंदी जैसे भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध हो। आखिरकार इंदौर स्थित श्री गोविंदराम सेकसरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (SGSITS) ने ऐलान कर दिया है कि आने वाले सत्र से इंजीनियरिंग की कई ब्रांचें हिंदी माध्यम में भी उपलब्ध होंगी (इंजीनियरिंग हिंदी माध्यम)।
यह फैसला न सिर्फ इंदौर के छात्रों के लिए, बल्कि पूरे प्रदेश के उन युवाओं के लिए राहत की सांस लेकर आया है जो अंग्रेजी के दबाव से तकनीकी पढ़ाई करने में असहज महसूस करते थे।
कौन-कौन सी ब्रांचें होंगी हिंदी में उपलब्ध?
संस्थान ने पहले चरण में सिविल इंजीनियरिंग, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग को हिंदी माध्यम में शुरू करने की घोषणा की है। इन तीनों ब्रांचों में 60-60 सीटें अलग से रखी गई हैं। यानी अब छात्र चाहें तो अंग्रेजी या हिंदी – अपनी सुविधा के हिसाब से माध्यम चुन सकते हैं।
इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांच के लिए भी प्रस्ताव भेजा गया है। अगर इसे मंजूरी मिल जाती है तो कुल मिलाकर पाँच ब्रांचें हिंदी में पढ़ाई जाएँगी। यह संख्या आने वाले समय में और भी बढ़ सकती है।
क्यों है यह फैसला खास?
इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसी उच्च तकनीकी पढ़ाई अब तक लगभग पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम पर निर्भर रही है। इससे उन छात्रों को दिक्कत होती थी जिनका स्कूलिंग बैकग्राउंड हिंदी माध्यम का रहा है। अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण या अर्धशहरी इलाकों से आने वाले प्रतिभाशाली छात्र केवल भाषा की वजह से पीछे रह जाते थे।
अब जब इंदौर जैसे शिक्षा केंद्र में हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू होगी, तो हजारों छात्रों को लाभ मिलेगा। वे अब concepts को अपनी मातृभाषा में बेहतर ढंग से समझ पाएँगे और आत्मविश्वास के साथ अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएँगे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का असर
दरअसल, यह पूरा कदम केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का हिस्सा है। NEP ने साफ कहा है कि मातृभाषा या स्थानीय भाषाओं में उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसका मकसद यह है कि भाषा किसी भी छात्र के लिए बाधा न बने।
इसी दिशा में IITs और AICTE भी धीरे-धीरे हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की किताबें और सामग्री उपलब्ध कराने पर काम कर रहे हैं। SGSITS, इंदौर का यह कदम इस दिशा में एक बड़ा और व्यावहारिक उदाहरण है।
छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया
जब यह खबर फैली तो इंदौर और आसपास के क्षेत्रों के छात्रों और उनके माता-पिता ने इसे खुले दिल से सराहा। कई छात्रों का कहना है कि अब वे तकनीकी पढ़ाई में सिर्फ concepts और innovation पर ध्यान दे पाएँगे, न कि dictionary खोलकर शब्दों का अर्थ ढूँढने पर।
कुछ छात्रों ने मजाकिया अंदाज में यह भी कहा – “अब हमें thermodynamics के बड़े-बड़े definitions को अंग्रेजी में रटने की ज़रूरत नहीं होगी, हिंदी में समझना और याद रखना आसान हो जाएगा।”
रोजगार और भविष्य पर असर
एक बड़ा सवाल यह है कि हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग करने वाले छात्रों का भविष्य कैसा होगा? क्या उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत आएगी? इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा कोई खतरा नहीं है।
आजकल कंपनियाँ skills और practical knowledge पर ज्यादा ध्यान देती हैं। यदि छात्र अपनी concepts और तकनीकी समझ मजबूत रखते हैं, तो भाषा बड़ी बाधा नहीं बनेगी। इसके अलावा, कई सरकारी नौकरियों और देश के भीतर की private कंपनियों में हिंदी माध्यम से पढ़े छात्र भी अच्छे पदों पर पहुँच रहे हैं।
हाँ, विदेशों में higher studies या job opportunities पाने के लिए अंग्रेजी का महत्व रहेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हिंदी माध्यम छात्रों को पीछे छोड़ देगा। बल्कि, यह फैसला उन छात्रों को अवसर देगा जो अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण पहले इंजीनियरिंग करने से कतराते थे।
सिलेबस और किताबें भी होंगी हिंदी में
SGSITS प्रशासन ने बताया कि हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अलग से सिलेबस और किताबें तैयार की जा रही हैं। AICTE और टेक्निकल यूनिवर्सिटीज़ पहले ही कई टेक्निकल किताबों का हिंदी अनुवाद तैयार कर रही हैं।
शिक्षकों को भी हिंदी माध्यम में पढ़ाने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि वे students को कठिन technical terms को सरल भाषा में समझा सकें।
इंदौर की शिक्षा छवि को मिलेगा बढ़ावा
इंदौर पहले से ही शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। यहाँ से हजारों छात्र IITs, NITs और विदेशों तक पहुँच चुके हैं। अब हिंदी माध्यम इंजीनियरिंग शुरू होने से इंदौर की पहचान और मजबूत होगी। यह पहल प्रदेश के अन्य शहरों, जैसे भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में भी जल्द अपनाई जा सकती है।

निष्कर्ष
SGSITS, इंदौर का यह कदम एक ऐतिहासिक पहल है। यह साबित करता है कि भाषा ज्ञान का रास्ता रोक नहीं सकती। अब इंजीनियरिंग के छात्र अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करके आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकेंगे। आने वाले वर्षों में यह बदलाव भारत के तकनीकी शिक्षा जगत को एक नया आयाम देगा।

