प्रशासनिक अधिकारी केवल कुर्सी तक सीमित न रहकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को दिल से निभाते हैं, तब मानवता की मिसाल कायम होती है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है इंदौर कलेक्टर आशीष सिंह ने। उन्होंने उन बच्चों के भविष्य को संवारने की ठानी जो आर्थिक तंगी की वजह से शिक्षा से वंचित हो सकते थे। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सैलरी से 22 से 34 जरूरतमंद बच्चों की स्कूल फीस भरकर यह साबित कर दिया कि सच्चा प्रशासनिक अधिकारी वही है जो समाज की जड़ों तक जुड़ा हो।
🌱ऐसे हुई शुरुआत :
सरकारी स्कूलों में नाममात्र फीस ली जाती है, लेकिन सीएम राइज़ स्कूलों में यह थोड़ी ज्यादा होती है । ऐसे में मूसाखेड़ी स्थित सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल के कुछ छात्रों ने ‘स्कूल चलो अभियान’ के तहत अपनी समस्याएँ बताईं। इन बच्चों की पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। उनके माता-पिता मेहनत-मजदूरी करके जैसे-तैसे घर चलाते हैं। ऐसे में स्कूल फीस और परीक्षा शुल्क भरना उनके लिए संभव नहीं था। इस संवेदनशील जानकारी को जानने के बाद, इंदौर के कलेक्टर आशीष सिंह ने अपने वेतन से इन छात्रों की फीस जमा की ताकि कोई भी छात्र परीक्षा से वंचित न रहे। कलेक्टर ने न सिर्फ अपने वेतन से फीस जमा की, बल्कि यह एक सामूहिक प्रयास भी था जिसमें कुछ दानदाताओं ने भी मदद की।
💸 अपनी सैलरी से भरी फीस:
कलेक्टर साहब ने स्कूल प्रशासन से बातचीत की और यह जानकारी ली कि कितने बच्चे फीस ना भर पाने के कारण पढ़ाई छोड़ने की कगार पर हैं। जांच में सामने आया कि कुल 22+ ऐसे बच्चे हैं जिनके माता-पिता फीस भरने में असमर्थ हैं। ऐसे में बिना किसी औपचारिक प्रचार या दिखावे के, आशिष सिंह ने इन सभी बच्चों की एक वर्ष की स्कूल फीस अपनी खुद की तनख्वाह से चुका दी।
❤️ मानवता की सच्ची मिसाल:
आज के समय में जब अधिकांश लोग अपने फायदे के लिए पदों का उपयोग करते हैं, ऐसे में एक कलेक्टर का यह कदम समाज को यह सिखाता है कि वास्तविक सेवा केवल भाषणों से नहीं, कर्म से होती है। उनका यह कदम सिर्फ उन बच्चों के जीवन को नहीं बदलता, बल्कि पूरे समाज को एक नई दिशा देता है।
🧒 बच्चों के भविष्य में नया उजाला:
जिन बच्चों की फीस भरी गई, वे सभी सरकारी में पढ़ाई कर रहे थे। केवल आर्थिक समस्या उनके मार्ग में बाधा बन रही थी। कलेक्टर के इस सहयोग के बाद अब वे सभी बच्चे फिर से स्कूल जा रहे हैं और उनके माता-पिता की आंखों में कृतज्ञता और उम्मीद की चमक है।
📢 समाज को संदेश:
आशिष सिंह का यह कदम यह भी दर्शाता है कि अगर प्रशासन चाहे तो शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के हर क्षेत्र में आम आदमी के जीवन को सकारात्मक रूप से बदला जा सकता है। उनके इस कदम को न केवल इंदौर में बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में सराहा जा रहा है।
🙌 सामाजिक जिम्मेदारी की ओर एक कदम:
यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से उठाए गए छोटे-छोटे कदम भी बड़ी सामाजिक क्रांति का हिस्सा बन सकते हैं। यदि हर सक्षम व्यक्ति समाज के एक या दो बच्चों की शिक्षा का जिम्मा ले, तो आने वाले वर्षों में देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार वास्तविक रूप से मिल सकता है।
🔚 निष्कर्ष:
इंदौर कलेक्टर श्री आशिष सिंह ने जो किया, वह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक भावनात्मक, नैतिक और मानवीय निर्णय था। ऐसे अधिकारियों की जरूरत देश को है जो पद से नहीं, अपने कर्म से महान बनें। उनका यह कदम कई लोगो के लिए के लिए एक प्रेरणा बनेगा।

📚 स्कूल चलो अभियान
भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक महत्वपूर्ण शिक्षा-संबंधी कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूल से जोड़ना है। यह अभियान खासतौर पर उन बच्चों पर केंद्रित होता है जो आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक कारणों से स्कूल नहीं जा पाते। इसकी शुरुआत पहली बार 2001 में उत्तर प्रदेश में हुई थी, लेकिन बाद में इसे पूरे देश में अपनाया गया।अभियान के अंतर्गत शिक्षक, सरकारी अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवी संगठन घर-घर जाकर अभिभावकों को जागरूक करते हैं कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजें। इस पहल में झांकी, रैली, नारा लेखन, दीवार चित्रण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता है ताकि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों तक भी संदेश पहुंचे।इस अभियान ने देश में स्कूल ड्रॉपआउट रेट को कम करने में मदद की है और बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि भी बढ़ाई है। ‘हर बच्चा पढ़े, हर बच्चा बढ़े’ इसी सोच के साथ यह अभियान शिक्षा को जन-आंदोलन बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
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