Quick Highlights
- इंदौर की एक सरकारी ITI में मूक-बधिर छात्रों से पढ़ाई की जगह सफाई और अन्य काम कराए जाने का आरोप
- कंप्यूटर जैसे तकनीकी कोर्स सिर्फ कागजों में, हकीकत में न पढ़ाई न ट्रेनिंग
- साइन लैंग्वेज जानने वाले योग्य शिक्षकों की भारी कमी
- हॉस्टल और मेस की हालत बेहद खराब, बुनियादी सुविधाओं का अभाव
- शिकायत करने पर छात्रों को डराने-धमकाने के भी आरोप
- मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच के आदेश दिए
360 विश्लेषण
इंदौर की इस सरकारी ITI से सामने आई तस्वीर सिर्फ एक संस्थान की नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियों की कहानी कहती है। जिन मूक-बधिर छात्रों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यहां दाखिला दिया गया, वही छात्र आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
पढ़ाई की जगह मजदूरी?
छात्रों का आरोप है कि उन्हें नियमित कक्षाओं के दौरान कंप्यूटर सीखने के बजाय परिसर की सफाई, इधर-उधर के काम और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां दी जाती हैं। तकनीकी शिक्षा का मकसद रोजगार देना होता है, लेकिन बिना ट्रेनिंग डिग्री सिर्फ एक कागज बनकर रह जाती है।
संवाद की सबसे बड़ी दीवार
मूक-बधिर छात्रों के लिए साइन लैंग्वेज जानने वाले प्रशिक्षक अनिवार्य होते हैं, लेकिन यहां न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही प्रभावी दुभाषिए। नतीजा ये कि छात्र न तो विषय समझ पाते हैं और न ही सवाल पूछ पाते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधा भेदभाव भी माना जा सकता है।
हॉस्टल की हालत भी बदतर
रहने की व्यवस्था भी किसी परीक्षा से कम नहीं है। शौचालय खराब, पानी की समस्या, मच्छरों से बचाव का कोई इंतजाम नहीं और खाने की गुणवत्ता पर भी सवाल। ऐसे माहौल में पढ़ाई की उम्मीद करना खुद में एक मजाक लगता है।
डर और दबाव के आरोप
छात्रों का यह भी कहना है कि अगर वे शिकायत करते हैं तो उन्हें परीक्षा में फेल करने या अन्य परेशानियां खड़ी करने की धमकी दी जाती है। यहां तक कि कुछ सुविधाओं के नाम पर पैसों की मांग के आरोप भी लगाए गए हैं, जो मामले को और गंभीर बना देते हैं।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
मामला सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही गई है और जांच शुरू की गई है। हालांकि असली सवाल यह है कि क्या यह जांच सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेगी या जमीनी स्तर पर बदलाव भी देखने को मिलेगा।
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ एक ITI का नहीं है, बल्कि उन हजारों दिव्यांग छात्रों की उम्मीदों का है जो हुनर सीखकर सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं। अगर तकनीकी शिक्षा के नाम पर उन्हें श्रम, खराब हालात और डर ही मिले, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाज़मी है।
अब देखना यह है कि जांच के बाद सिर्फ बयान आएंगे या वाकई पढ़ाई, सुविधाएं और सम्मान — तीनों वापस मिलेंगे।
