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श्री दिगंबर जैन मंदिर, द्वारकापुरी में इस वर्ष चातुर्मास का पावन सौभाग्य परम पूज्य 108 मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की दिव्य उपस्थिति में प्राप्त हुआ। यह आध्यात्मिक आयोजन समस्त जैन समाज के लिए श्रद्धा, संयम और आत्मचिंतन का केंद्र बना रहा।

चातुर्मास के दौरान मुनिश्री ने प्रवचन के माध्यम से धर्म, अहिंसा और आत्मकल्याण पर अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से उपस्थित होकर धर्मलाभ लेते रहे। इस दौरान तप, स्वाध्याय, संयम और साधना की मिसाल देखने को मिली।

मंदिर समिति और स्थानीय समाज ने मुनिश्री की आगवानी से लेकर विदाई तक सम्पूर्ण आयोजन को भक्ति, सेवा और समर्पण भाव से सम्पन्न किया। चातुर्मास की पूर्णाहुति पर भव्य मंगल कलश यात्रा, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन भी किया गया, जिसने समूचे क्षेत्र को धार्मिक वातावरण से ओतप्रोत कर दिया।

दिगंबर जैन चातुर्मास का महत्व

दिगंबर जैन परंपरा में चातुर्मास का समय बेहद पवित्र, अनुशासित और आध्यात्मिक साधना का होता है। ‘चातुर्मास’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसमें ‘चातुर्’ का अर्थ होता है चार और ‘मास’ का अर्थ है महीने। यह समय आमतौर पर आषाढ़ मास की पूर्णिमा से लेकर कार्तिक मास की पूर्णिमा तक यानी लगभग चार महीनों का होता है। इस दौरान दिगंबर जैन मुनि एक ही स्थान पर ठहर कर अध्यात्म, तप, ध्यान और प्रवचन में लीन रहते हैं। सामान्य रूप से दिगंबर मुनि पूरे साल विहार करते रहते हैं, यानी एक जगह से दूसरी जगह पैदल चलते रहते हैं, लेकिन चातुर्मास में वे स्थिर रहते हैं — और यही स्थिरता इस समय को विशेष बनाती है।

इस चार महीने के समय को ‘धर्म आराधना’ और ‘आत्मचिंतन’ का सर्वोत्तम अवसर माना जाता है। जैन दर्शन के अनुसार, वर्षा ऋतु के दौरान धरती पर असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं — कीट-पतंगे, सूक्ष्म जीव, जो हमारे पैरों तले कुचल सकते हैं। इसलिए अहिंसा के मूल सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए मुनियों का विहार इस अवधि में बंद हो जाता है। मुनि जहां होते हैं, वहीं ठहरते हैं और वहां प्रवचन, शास्त्र चर्चा, सामायिक, प्रत्याख्यान, स्वाध्याय जैसे धार्मिक क्रियाकलाप करते हैं। इस ठहराव में स्थिरता होती है, और यही स्थिरता आत्मा की ओर झुकाव को और भी गहरा बनाती है।

चातुर्मास केवल मुनियों के लिए ही नहीं, बल्कि श्रावक-श्राविकाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान वे भी अपने दैनिक जीवन में संयम, त्याग और साधना को अपनाने का प्रयास करते हैं। लोग ज्यादा से ज्यादा सामायिक करते हैं, अष्टान्हिका, पर्युषण पर्व, क्षमावाणी जैसे पर्वों को श्रद्धा से मनाते हैं। इस समय कई लोग उपवास करते हैं, एकासन, ब्यालु, नवकारसी जैसे नियमों का पालन करते हैं। छोटे-छोटे नियम लेकर भी लोग इस अवधि को एक आत्मिक यात्रा में बदल देते हैं। यही नहीं, बहुत से लोग अपने घरों में मुनिराजों को निवेदन करके प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। ये प्रवचन केवल धार्मिक ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।

दिगंबर परंपरा में चातुर्मास के दौरान ‘दशलक्षण पर्व’ और ‘पर्युषण’ जैसे उत्सव आते हैं जो आत्मशुद्धि और आत्मावलोकन के पर्व माने जाते हैं। दस लक्षण — क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्यता और ब्रह्मचर्य — को जीवन में अपनाने का वास्तविक अभ्यास इसी समय होता है। ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि जीने का तरीका हैं। चातुर्मास इन गुणों को समझने, अपनाने और आचरण में लाने का सबसे उत्तम समय है।

जो मुनिराज इस चातुर्मास में किसी गांव या शहर में ठहरते हैं, वहां के लोग भी अपने आप को सौभाग्यशाली मानते हैं। उनके सत्संग, वाणी और संयममय जीवन को देखकर सामान्य जन भी प्रभावित होते हैं। चातुर्मास में केवल धार्मिक वातावरण नहीं बनता, बल्कि एक सकारात्मक सामाजिक माहौल भी तैयार होता है। मंदिरों में पूजा, स्वाध्याय, प्रवचन और अन्य धार्मिक क्रियाएं लोगों को जोड़ती हैं, एकता और भाईचारे का भाव बढ़ता है।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में चातुर्मास हमें रुकने, सोचने और खुद को जानने का एक मौका देता है। ये चार महीने केवल कैलेंडर के पन्नों पर नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर एक बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं — अगर हम चाहें तो। संयम, साधना और स्वच्छता का यह पर्व केवल परंपरा नहीं है, यह आत्मा की ओर लौटने का रास्ता है। यही कारण है कि दिगंबर जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहराई से आत्मिक और व्यवहारिक भी है।

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