360 न्यूज़ टुडे | इंदौर महर्षि दधीचि कांवड़ यात्रा का आज से शुभारंभ हो गया। यह यात्रा 25 जुलाई से 27 जुलाई 2025 तक आयोजित की जा रही है, जिसमें श्रद्धालु महर्षि दधीचि प्रतिमा, चाणक्यपुरी चौराहे से बाबा महाकाल मंदिर, उज्जैन तक पैदल कांवड़ लेकर जाएंगे।

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सुबह 8 बजे चाणक्यपुरी चौराहा स्थित महर्षि दधीचि प्रतिमा से यात्रा की शुरुआत की गई। यात्रा के दौरान भक्तजनों ने “बोल बम” के जयघोष करते हुए हर-हर महादेव के नारों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इस विशाल यात्रा का आयोजन भारतवर्षीय दधीचि ब्राह्मण समाज एवं श्री महामाया दधिमती नेमावर मंदिर समिति द्वारा किया जा रहा है, जिसके अध्यक्ष पं. अभिषेक दधीचि हैं। यात्रा का उद्देश्य समाज में धार्मिक चेतना का प्रचार-प्रसार करना और सनातन परंपराओं को जीवंत बनाए रखना है।


कांवड़ यात्रा का महत्त्व

कांवड़ यात्रा हिन्दू धर्म की एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी यात्रा है, जो श्रावण मास में भगवान शिव को समर्पित होती है। इसमें श्रद्धालु दूर-दूर से पवित्र नदियों से गंगाजल या नर्मदाजल लाकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाते हैं। इस यात्रा के माध्यम से भक्त अपनी भक्ति, तपस्या और समर्पण भाव का प्रदर्शन करते हैं।

📿 क्यों की जाती है कांवड़ यात्रा?

मान्यता है कि श्रावण मास में भगवान शिव स्वयं पृथ्वी पर निवास करते हैं और इस माह में किया गया जलाभिषेक उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।

कांवड़ लाने वाला भक्त शिव का विशेष कृपापात्र बनता है।

यह यात्रा न केवल शरीर की परीक्षा होती है, बल्कि मन, आत्मा और आस्था की भी कसौटी होती है|

आज की युवा पीढ़ी को इस यात्रा के माध्यम से संस्कार, सेवा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भी बोध कराया जाता है।

🚩 सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण

कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन है:

इसमें शामिल होकर लोग नशा, बुराई और अहंकार का त्याग करते हैं।

युवा पीढ़ी को सनातन धर्म से जोड़ने का यह प्रभावी माध्यम बन चुका है।

यात्रा मार्ग में भजन, कीर्तन, झांकियों और रथयात्रा के माध्यम से सम्पूर्ण समाज में धार्मिक चेतना का संचार होता है।

🙏 श्रद्धा, अनुशासन और सेवा भाव की मिसाल

इस यात्रा में शामिल होने वाले कांवड़िये पूरी यात्रा पैदल तय करते हैं, कई बार नंगे पांव चलते हैं। वे रास्ते भर किसी को कष्ट न हो, इसका पूरा ध्यान रखते हैं। रास्ते में सेवा शिविर, भोजन वितरण, चिकित्सा शिविर जैसी व्यवस्थाएं सामूहिक सेवा और सहयोग की भावना को बढ़ावा देती हैं।

kaawar yatra

कांवड़ यात्रा: आस्था, परंपरा और समर्पण का महापर्व

भारत की धार्मिक विविधता और आस्था की गहराई को दर्शाने वाले अनेक पर्वों में से एक है कांवड़ यात्रा, जो विशेष रूप से सावन मास में होती है। यह यात्रा न सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा, अनुशासन और आंतरिक शक्ति का प्रतीक भी है। उत्तर भारत के हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख और अन्य पवित्र स्थलों से शुरू होकर यह यात्रा शिवभक्तों को भगवान भोलेनाथ के चरणों तक ले जाती है।

कांवड़ यात्रा क्या है?

कांवड़ यात्रा वह धार्मिक यात्रा है जिसमें शिवभक्त—जिन्हें कांवड़िया कहा जाता है—पवित्र नदियों से गंगाजल लेकर पैदल चलते हुए अपने-अपने गांवों, शहरों या शिवालयों में जाकर उस जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और इसका उल्लेख स्कंद पुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है।

यात्रा की विशेषताएं

कांवड़ यात्रा एक ऐसी अनोखी धार्मिक यात्रा है जिसमें आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। कांवड़िए सिर पर या कंधों पर संतुलन बनाए रखते हुए कांवड़ में गंगाजल भरकर चलते हैं। यात्रा के दौरान वे “बोल बम!” के जयघोष करते हैं और पूरा माहौल शिवमय हो जाता है।

  • कांवड़ यात्रा सामान्यतः सावन माह के पहले सोमवार से लेकर श्रावण पूर्णिमा तक की जाती है।
  • इसमें भाग लेने वाले अधिकतर लोग पैदल यात्रा करते हैं, कुछ साइकिल, ट्रक, और यहां तक कि बैलगाड़ी से भी यात्रा करते हैं।
  • हरिद्वार, देवघर, वाराणसी, झारखंड और बिहार में यह यात्रा अत्यंत लोकप्रिय है।

कांवड़ यात्रा का आध्यात्मिक महत्व

भगवान शिव को जल प्रिय है। मान्यता है कि सावन मास में गंगाजल से उनका अभिषेक करने से सभी पापों का नाश होता है और भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह यात्रा शिव के प्रति समर्पण, संयम, और श्रद्धा की चरम सीमा का उदाहरण है। कांवड़ यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।

सामाजिक संदेश

कांवड़ यात्रा हमें अनुशासन, सहिष्णुता और सेवा का पाठ पढ़ाती है। इस दौरान कई जगहों पर सेवा शिविर लगाए जाते हैं जहां यात्रियों को निःशुल्क भोजन, दवा, और विश्राम की सुविधा दी जाती है। इन सेवाओं में समाज के विभिन्न वर्गों का योगदान रहता है, जिससे आपसी भाईचारे को बल मिलता है।

विवाद और जिम्मेदारी

हालांकि, कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा के दौरान ट्रैफिक जाम, ध्वनि प्रदूषण, और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। यह ज़रूरी है कि श्रद्धा के साथ-साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी का भी पालन हो। पुलिस प्रशासन और स्थानीय संस्थाएं मिलकर इसे सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


निष्कर्ष

कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह एक ऐसा अनुभव है जिसमें भक्त आत्मशुद्धि, संयम और सेवा के मार्ग पर चलते हैं। यह यात्रा हमें सिखाती है कि यदि मन में सच्ची आस्था और भक्ति हो, तो इंसान किसी भी कठिन राह को पार कर सकता है। आज जब आधुनिकता के दौर में बहुत सी परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, कांवड़ यात्रा एक ऐसी जीवंत परंपरा है जो न केवल जीवित है, बल्कि हर वर्ष और भी भव्य रूप में दिखाई देती है.

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