Quick Highlights

  • थिरुपरनकुंदरम मंदिर–दरगाह क्षेत्र में दीप जलाने की अनुमति पर विवाद बढ़ा
  • मद्रास हाई कोर्ट के जज G.R. स्वामीनाथन ने दीपम जलाने की अनुमति दी थी
  • DMK और INDIA गठबंधन के 107+ सांसदों ने जज के खिलाफ इम्पीचमेंट नोटिस दिया
  • विपक्ष ने जज पर पक्षपात और धार्मिक झुकाव का आरोप लगाया
  • BJP और कई कानूनी विशेषज्ञों ने नोटिस को ‘राजनीतिक कदम’ बताया
  • इस मुद्दे ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी

📘 360 विश्लेषण

तमिलनाडु के मदुरै स्थित थिरुपरनकुंदरम क्षेत्र में मंदिर और दरगाह, दोनों ही सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व की मिसाल रहे हैं। लेकिन 1 दिसंबर 2025 को मद्रास हाई कोर्ट के जज G.R. स्वामीनाथन के एक फैसले ने इस शांत क्षेत्र में राजनीतिक-पारंपरिक बहस को तेज कर दिया। जज ने कहा कि भक्त यहां पारंपरिक दीपम जला सकते हैं और इससे किसी समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। प्रशासन ने जब आदेश को लागू करने में देरी की, तो 3 दिसंबर को अदालत ने CISF सुरक्षा के साथ भक्तों को खुद दीप जलाने की अनुमति दे दी। यहीं से विवाद ने राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया।

DMK और INDIA गठबंधन के नेताओं ने इस फैसले को “एकतरफा” बताया और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। इसके बाद लगभग 107–120 सांसदों ने लोकसभा में जज के खिलाफ इम्पीचमेंट नोटिस प्रस्तुत कर दिया। DMK के साथ-साथ कांग्रेस की प्रियांका गांधी वाड्रा और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने भी इस कदम का समर्थन किया। उनका आरोप है कि जज का फैसला धार्मिक झुकाव से प्रभावित दिखता है, जो संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ है।

दूसरी ओर, BJP और कई कानूनी जानकारों ने इस नोटिस को राजनीति से प्रेरित बताया है। उनका कहना है कि जज ने केवल भक्तों के धार्मिक अधिकार को सुरक्षित रखा और मुस्लिम समुदाय की ओर से कोई औपचारिक आपत्ति भी नहीं थी। BJP का तर्क है कि विपक्ष न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जिससे आने वाले समय में संवेदनशील मामलों पर अदालतें खुलकर फैसला देने में हिचक सकती हैं।

यह विवाद असल में तीन प्रमुख मुद्दों को छूता है—धार्मिक परंपराओं का अधिकार, राजनीतिक दलों का एजेंडा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता। इम्पीचमेंट नोटिस जैसे गंभीर कदम का इस्तेमाल अगर राजनीतिक रूप से होने लगे, तो यह न्यायिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली के लिए चुनौती बन सकता है। वहीं, DMK और विपक्ष का कहना है कि फैसले की निष्पक्षता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।

कुल मिलाकर, दीपम विवाद अब एक अदालती मामला भर नहीं रहा; यह तमिलनाडु की राजनीति, राष्ट्रीय बहस और धार्मिक-सामाजिक संतुलन का बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले महीनों में इसका असर तमिलनाडु की चुनावी राजनीति से लेकर देशव्यापी न्यायिक विमर्श पर दिख सकता है।


🔚 निष्कर्ष

थिरुपरनकुंदरम दीपम विवाद अब केवल धार्मिक परंपरा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, राजनीतिक रणनीति और सामाजिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन गया है। इम्पीचमेंट नोटिस के परिणाम चाहे जो हों, लेकिन इस केस ने यह संदेश जरूर दे दिया है कि धार्मिक फैसले अब अदालतों से निकलकर सीधा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच चुके हैं।

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