भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) इन दिनों लगातार कड़ी कार्रवाई कर रहा है। इसका असर अब सीधे उन राजनीतिक दलों पर पड़ा है जो कई वर्षों से निष्क्रिय पड़े थे। हाल ही में आयोग ने देशभर में 474 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs – Registered Unrecognised Political Parties) को डीलिस्ट कर दिया। इनमें से अकेले मध्य प्रदेश की 23 पार्टियां शामिल हैं। आयोग का कहना है कि ये दल न तो समय पर वित्तीय रिपोर्ट जमा कर रहे थे और न ही चुनावी प्रक्रिया में सक्रियता दिखा रहे थे।


चुनाव आयोग की सख्ती क्यों?

भारत में राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 29A के तहत होता है। इसके अनुसार हर राजनीतिक दल को:

  • हर साल अपना ऑडिटेड अकाउंट (Audited Accounts) जमा करना होता है।
  • चुनाव में खर्च का ब्यौरा देना होता है।
  • नियमित रूप से चुनाव लड़ना होता है।

लेकिन हकीकत यह है कि सैकड़ों दल सिर्फ कागज़ों पर पंजीकृत होकर रह गए थे। वे न तो चुनाव लड़ रहे थे और न ही अपनी गतिविधियाँ रिपोर्ट कर रहे थे। ऐसे दलों को अक्सर “पेपर पार्टी” कहा जाता है। आयोग को आशंका रहती है कि इनका इस्तेमाल गलत कामों के लिए भी हो सकता है, जैसे काले धन को सफेद बनाने या फर्जी चंदा जुटाने में। यही वजह है कि अब चुनाव आयोग ने कठोर कदम उठाए हैं।


एमपी पर फोकस: 23 दल हुए बाहर

मध्य प्रदेश, जो देश की राजनीति में हमेशा अहम राज्य माना जाता है, वहां भी यह कार्रवाई देखने को मिली। 23 राजनीतिक दल अब चुनाव आयोग की सूची से बाहर हो चुके हैं। इनमें से अधिकतर छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल हैं जिनका नाम तो था लेकिन मैदान में सक्रियता बहुत कम रही।

कई बार देखा गया है कि चुनाव के दौरान सिर्फ नाम मात्र की उपस्थिति दर्ज कराने वाले ये दल बाद में पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। न कोई कार्यकर्ता सक्रिय, न कोई प्रचार अभियान, और न ही कोई संगठनात्मक काम। ऐसे में आयोग की नज़र इन पर पड़ना तय था।


देशभर में कितनी बड़ी कार्रवाई?

मध्य प्रदेश ही नहीं, आयोग ने यह कार्रवाई 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैले दलों पर की है। आंकड़े बताते हैं कि:

  • 474 दल पूरी तरह डीलिस्ट कर दिए गए।
  • 359 दल ऐसे हैं जिनकी पहचान की गई है कि उन्होंने तीन वित्तीय वर्षों से ऑडिट रिपोर्ट नहीं सौंपी।

यह आंकड़े अपने आप में दिखाते हैं कि भारत में पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या कितनी ज्यादा है, लेकिन सक्रियता के नाम पर असल में बहुत कम दल ही मैदान में नज़र आते हैं।


क्या है डीलिस्टिंग का असर?

अब सवाल यह उठता है कि इन पार्टियों पर इस कार्रवाई का असर क्या होगा?

  1. चुनावी चिन्ह की दावेदारी नहीं – ये दल किसी चुनाव चिन्ह को सुरक्षित रखने या पाने का दावा नहीं कर पाएंगे।
  2. सरकारी सुविधाएं खत्म – चुनावी विज्ञापनों, टेलीविज़न-रेडियो स्लॉट, या अन्य सुविधाओं से वंचित रहेंगे।
  3. साख पर असर – जनता के बीच उनकी राजनीतिक साख पर गहरा असर पड़ेगा, क्योंकि डीलिस्ट होने का मतलब है कि पार्टी निष्क्रिय मानी गई।
  4. वापसी का रास्ता कठिन – अगर ये दल भविष्य में सक्रिय होना भी चाहें तो उन्हें दोबारा से पूरी पंजीकरण प्रक्रिया से गुजरना होगा।

विपक्ष और छोटे दलों की प्रतिक्रिया

कई छोटे दलों ने इस कार्रवाई को “सख्ती से ज्यादा सफाई अभियान” कहा है। उनका मानना है कि आयोग यह कदम इसलिए उठा रहा है ताकि राजनीतिक व्यवस्था में पारदर्शिता आए। हालांकि कुछ नेताओं का कहना है कि हर दल को इतनी जल्दी निष्क्रिय मान लेना सही नहीं है, क्योंकि छोटे दलों के पास संसाधनों की कमी रहती है।

लेकिन बड़ा सच यही है कि राजनीतिक दल चाहे बड़े हों या छोटे, अगर वे चुनावी प्रक्रिया में हिस्सेदारी नहीं दिखाते और वित्तीय नियमों का पालन नहीं करते, तो उनकी मौजूदगी का कोई मतलब नहीं रह जाता।


आम जनता के लिए क्या मायने?

इस कार्रवाई का सीधा असर जनता पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि ये दल पहले से ही सक्रिय राजनीति से बाहर थे। लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर यह होगा कि राजनीतिक व्यवस्था थोड़ी साफ और पारदर्शी नज़र आएगी। चुनाव आयोग का उद्देश्य भी यही है कि जनता के सामने वही दल हों जो वास्तव में राजनीति में सक्रिय हैं और जिनका जमीनी काम दिखाई देता है।


पारदर्शिता की ओर एक कदम

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां करोड़ों लोग मतदान करते हैं, वहां राजनीतिक दलों की भूमिका बेहद अहम होती है। अगर दल सिर्फ नाम के लिए बने रहेंगे और उनकी गतिविधियाँ जनता तक नहीं पहुँचेंगी, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी। इसलिए चुनाव आयोग की यह कार्रवाई एक तरह से लोकतंत्र की सफाई मुहिम है।


निष्कर्ष

मध्य प्रदेश की 23 राजनीतिक पार्टियों को डीलिस्ट करना एक बड़ी खबर है, लेकिन यह सिर्फ एमपी तक सीमित नहीं है। देशभर में सैकड़ों दलों पर इसी तरह की कार्रवाई हुई है। यह कदम दर्शाता है कि अब चुनाव आयोग सिर्फ नाम मात्र के पंजीकरण को मंज़ूर नहीं करेगा।

आगे चलकर यह साफ हो जाएगा कि भारत की राजनीति में वही दल टिकेंगे जो सच में जनता के बीच काम कर रहे हैं और नियमों का पालन कर रहे हैं। लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी ही सबसे बड़ी पहचान है — और यही संदेश आयोग ने इस कदम से दिया है।

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