नेपाल इन दिनों भीषण राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। सोशल मीडिया बैन, भ्रष्टाचार और सरकार की नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध ने अब हिंसक रूप ले लिया है। राजधानी काठमांडू और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों ने न केवल सड़कों पर आगजनी और तोड़फोड़ की, बल्कि सत्ता के शीर्ष नेताओं के घरों तक को निशाना बना डाला। हालात इतने बिगड़े कि राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के घर पर हमला हुआ और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल “प्रचंड” का घर आग के हवाले कर दिया गया।
विरोध की शुरुआत और जेन-जेड की भूमिका
इस पूरे आंदोलन को नेपाल की युवा पीढ़ी यानी “जेन-जेड” (Gen-Z) ने आगे बढ़ाया। सोशल मीडिया पर पाबंदी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के खिलाफ गुस्सा पहले ऑनलाइन दिखा, लेकिन देखते ही देखते यह सड़कों पर उतर आया। हजारों युवाओं ने काठमांडू और प्रमुख शहरों में प्रदर्शन शुरू कर दिए। शुरुआत में ये शांतिपूर्ण लगे, मगर सरकार की कठोर कार्रवाई और पुलिस बल के इस्तेमाल ने इन्हें हिंसक बना दिया।
राष्ट्रपति के घर पर हमला
नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के निजी आवास को भीड़ ने घेर लिया। वीडियो फुटेज में दिखा कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन के बाहर जमा हो गए और अंदर घुसकर तोड़फोड़ की। कुछ वीडियो में इमारत से धुआँ और आग की लपटें उठती दिखाई दीं। इससे यह साफ हो गया कि प्रदर्शनकारी अब सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्ता के प्रतीक चिन्हों को सीधा चुनौती दे रहे हैं।
प्रचंड का घर जलाया
पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड, जो माओवादी आंदोलन से सत्ता तक पहुँचे थे, अब जनता के गुस्से का निशाना बन गए। लालितपुर स्थित उनके घर को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में उनके घर से धुआँ उठता साफ नजर आया। दिलचस्प यह है कि कभी प्रचंड खुद “क्रांतिकारी” छवि के लिए मशहूर थे, और आज उन्हीं के खिलाफ जनता ने क्रांति का रूप अख्तियार कर लिया।
अन्य नेताओं और संपत्तियों पर भी हमला
यह आंदोलन सिर्फ राष्ट्रपति और प्रचंड तक ही सीमित नहीं रहा। नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के घर को भी आग लगा दी गई। गृहमंत्री रमेश लेखक का घर जलाया गया, जबकि कांग्रेस के कार्यालय और कई मंत्रियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया गया। संसद भवन और सरकारी परिसरों में भी प्रदर्शनकारियों ने जमकर तोड़फोड़ की।
मौत और तबाही का आंकड़ा
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक इस हिंसा में कम से कम 19 लोगों की मौत हो चुकी है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं। कई अस्पतालों में घायलों का इलाज चल रहा है। काठमांडू की सड़कों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें लगातार जारी हैं। जगह-जगह कर्फ्यू जैसे हालात हैं और सुरक्षा बलों को अलर्ट पर रखा गया है।
सरकार और मंत्रियों के इस्तीफे
हालात इतने बिगड़े कि सरकार को सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध हटाने पड़े। दबाव बढ़ने पर गृह मंत्री रमेश लेखक ने इस्तीफा दे दिया। कृषि और स्वास्थ्य मंत्री समेत कई बड़े नेताओं ने भी अपने पद छोड़े। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। इसके बाद से नेपाल की राजनीति में अस्थिरता और गहराती नजर आ रही है।
जनता का गुस्सा क्यों भड़का?
नेपाल के लोगों का गुस्सा सिर्फ सोशल मीडिया बैन पर नहीं है। वर्षों से जारी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और सरकार की नीतियों ने जनता को नाराज़ कर रखा है। खासतौर पर युवाओं का मानना है कि उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है और भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। यही कारण है कि विरोध में शामिल अधिकांश चेहरे 18 से 30 साल के युवाओं के हैं।
अंतरराष्ट्रीय चिंता
नेपाल में भड़की इस हिंसा ने पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी चिंता में डाल दिया है। भारत, चीन और अमेरिका की नजर इस संकट पर है। भारत ने अपने नागरिकों को नेपाल की यात्रा से बचने की सलाह दी है, वहीं संयुक्त राष्ट्र ने शांति और लोकतांत्रिक समाधान की अपील की है।
निष्कर्ष
नेपाल इस समय अपने आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक का सामना कर रहा है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं के घरों पर हमला होना यह दर्शाता है कि जनता का गुस्सा अब चरम पर है। यह आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम के खिलाफ विद्रोह में बदल गया है।
अगर स्थिति पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो नेपाल एक बार फिर गृहयुद्ध जैसी अराजकता की तरफ बढ़ सकता है। अब यह देखना होगा कि नई राजनीतिक व्यवस्था कैसी बनती है और जनता की नाराज़गी को शांत करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

