Quick Highlights
- टोक्यो में भारत-जापान के बीच अहम वार्ता के दौरान पीएम मोदी ने की बड़ी घोषणा।
- ISRO और जापान की स्पेस एजेंसी JAXA मिलकर बनाएंगे चंद्रयान-5 (LUPEX Mission)।
- मिशन का उद्देश्य: चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की बर्फ और संसाधनों की खोज।
- जापान देगा रॉकेट और रोवर, भारत बनाएगा लैंडर और वैज्ञानिक उपकरण।
- मिशन 2028–2029 में लॉन्च होने की संभावना।
- पीएम मोदी बोले – “यह सहयोग मानवता की प्रगति का प्रतीक होगा।”
- PM मोदी का बड़ा एलान
भूमिका
भारत और जापान के रिश्ते केवल कूटनीति और व्यापार तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि अब यह साझेदारी अंतरिक्ष की ऊँचाइयों तक पहुँच रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान दौरे के दौरान एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA मिलकर चंद्रयान-5 मिशन को अंजाम देंगे। इस मिशन का लक्ष्य होगा – चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की मौजूदगी और अन्य संसाधनों की खोज।
यह घोषणा केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारत-जापान के रिश्तों और एशिया की अंतरिक्ष शक्ति के लिहाज से भी बेहद अहम मानी जा रही है।
पीएम मोदी का बयान
टोक्यो में भारतीय प्रवासियों और जापानी नेताओं को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा –
“हम इसरो और JAXA के बीच चंद्रयान-5 मिशन के सहयोग का स्वागत करते हैं। यह केवल तकनीकी साझेदारी नहीं, बल्कि मानवता की साझा प्रगति का प्रतीक है। हमारा यह प्रयास धरती की सीमाओं से परे जाकर एक नए युग की शुरुआत करेगा।”
इस बयान के साथ ही यह साफ हो गया है कि भारत और जापान की संयुक्त टीम आने वाले वर्षों में चांद की सतह पर मिलकर काम करेगी।
चंद्रयान-5 क्या है?
भारत ने पहले ही चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 जैसे मिशनों से दुनिया को चौंका दिया है।
- चंद्रयान-1 ने चांद पर पानी के अंश की खोज कर पूरी दुनिया को नई दिशा दी।
- चंद्रयान-2 में लैंडिंग भले सफल नहीं हुई, लेकिन उसके ऑर्बिटर ने अब तक कई उपयोगी जानकारियाँ दी हैं।
- चंद्रयान-3 ने 2023 में सफल लैंडिंग कर इतिहास रचा और भारत को चांद की सतह पर उतरने वाला चौथा देश बना दिया।
अब चंद्रयान-5, जिसे तकनीकी नाम LUPEX (Lunar Polar Exploration Mission) दिया गया है, इस श्रंखला का अगला और सबसे महत्वाकांक्षी अध्याय होगा।
मिशन का उद्देश्य
इस मिशन का मुख्य लक्ष्य है चांद के दक्षिणी ध्रुव पर वैज्ञानिक अध्ययन।
- यह इलाका हमेशा छाया में रहता है, जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पहुँचतीं।
- वैज्ञानिकों का मानना है कि यहाँ पर बड़ी मात्रा में बर्फ के रूप में पानी मौजूद हो सकता है।
- पानी की मौजूदगी भविष्य में मानव बस्तियों, ईंधन निर्माण और लंबे समय तक अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद जरूरी है।
यानी चंद्रयान-5 सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य के स्पेस कॉलोनाइजेशन की दिशा में एक बड़ा कदम है।
भारत-जापान की भूमिका
इस मिशन में भारत और जापान की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से बाँटी गई हैं:
- जापान (JAXA): लॉन्च की जिम्मेदारी संभालेगा। इसके लिए जापान का आधुनिक H3-24L रॉकेट इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही JAXA एक रोवर भी भेजेगा।
- भारत (ISRO): लैंडर का निर्माण करेगा और मिशन के लिए जरूरी वैज्ञानिक उपकरण व प्रयोग विकसित करेगा।
इस तरह यह मिशन दोनों देशों की तकनीकी ताकत को एकसाथ जोड़कर एक साझा वैज्ञानिक उपलब्धि का रास्ता खोलेगा।
लॉन्च कब होगा?
मिशन की योजना के अनुसार इसे 2028–2029 के बीच लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, अंतरिक्ष अभियानों की जटिलताओं को देखते हुए सटीक तारीख में बदलाव हो सकता है। फिर भी, तैयारी का काम तेज़ी से शुरू कर दिया गया है।
भारत-जापान स्पेस सहयोग का नया अध्याय
भारत और जापान पहले भी कुछ वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स पर सहयोग कर चुके हैं, लेकिन यह मिशन दोनों देशों का अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त प्रयास होगा।
- जापान के पास उन्नत रॉकेट टेक्नोलॉजी है।
- भारत के पास चांद पर मिशन उतारने का वास्तविक अनुभव है।
दोनों की विशेषज्ञता जब एक मिशन में जुड़ेगी तो नतीजे और भी शानदार होंगे।
वैश्विक दृष्टि से महत्व
आज जब अमेरिका (NASA) अपने Artemis Program पर काम कर रहा है और चीन भी अपने चंद्र अभियानों में आक्रामक रूप से आगे बढ़ रहा है, ऐसे समय में भारत और जापान का यह सहयोग एशिया को अंतरिक्ष की नई सुपरपावर बना सकता है।
भारत ने पहले ही चंद्रयान-3 से दुनिया का ध्यान खींचा है, वहीं जापान की तकनीक और संसाधन इस मिशन को और मज़बूत बनाएँगे। यह साझेदारी दोनों देशों को वैश्विक मंच पर एक सशक्त अंतरिक्ष खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।

आर्थिक और रणनीतिक असर
यह केवल विज्ञान की बात नहीं है।
- पानी और संसाधनों की खोज से भविष्य में स्पेस इकॉनमी का रास्ता खुलेगा।
- दोनों देशों की टेक्नोलॉजी कंपनियों और वैज्ञानिक संस्थानों को नया अवसर मिलेगा।
- भारत-जापान की रणनीतिक साझेदारी को अमेरिका और यूरोप जैसे देशों से भी सराहना मिलेगी।
निष्कर्ष
जापान दौरे में पीएम मोदी की यह घोषणा सिर्फ एक “स्पेस न्यूज़” नहीं, बल्कि एशिया के लिए अंतरिक्ष की नई राजनीति और विज्ञान की साझेदारी का संकेत है।
चंद्रयान-5 (LUPEX) मिशन आने वाले वर्षों में न केवल भारत और जापान की तकनीकी क्षमताओं की परीक्षा होगा, बल्कि यह मानवता के भविष्य के लिए एक नींव रखने जैसा है।
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज से लेकर भविष्य की अंतरिक्ष बस्तियों तक, इस मिशन से जुड़ी संभावनाएँ अनगिनत हैं। पीएम मोदी का यह कहना कि “यह सहयोग मानवता की प्रगति का प्रतीक बनेगा” वाकई इस मिशन की असली आत्मा को दर्शाता है।
अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो 2028–2029 में चंद्रयान-5 की गूंज केवल भारत या जापान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया सुनने वाली है।

