Quick Highlights
- 🔶 सरस्वती शिशु मंदिर पंचमूर्ति नगर में सप्त शक्ति संगम का आयोजन
- 🔶 सैकड़ों मातृ शक्तियों ने उत्साहपूर्वक किया सहभाग
- 🔶 भारतीय परंपराओं के अनुसार त्योहार मनाने का संकल्प
- 🔶 मातृ शक्ति की भूमिका को महापुरुष निर्माण का आधार बताया
- 🔶 मोबाइल उपवास और अपनी भाषा-लिपि को बढ़ावा देने की अपील
विस्तृत विवरण (Detailed Body)
इंदौर। सरस्वती शिशु मंदिर पंचमूर्ति नगर में शुक्रवार को सप्त शक्ति संगम का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें सैकड़ों की संख्या में मातृ शक्तियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में माताओं की भूमिका, भारतीय परंपराओं के संरक्षण और विद्यार्थियों में श्रेष्ठ संस्कारों के निर्माण पर संवाद स्थापित करना था।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई। जैसे ही सभागार में मंत्रोच्चार गुंजे, वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। मातृ शक्तियों के उत्साह ने कार्यक्रम को और अधिक जीवंत बना दिया।
भारतीय परंपराओं को जीवन में उतारने की अपील
मुख्य अतिथि एवं क्षेत्र सह संयोजिका सप्तशती संगम हिना नीमा ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति को जीवन में अपनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम धीरे-धीरे अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं, जबकि दुनिया भारतीय ज्ञान और संस्कारों की ओर आकर्षित हो रही है।
उन्होंने मातृ शक्तियों से आग्रह किया कि वे अपने घरों और बच्चों के लिए एक आदर्श बनें। नीमा ने कहा—
“हमें संकल्प लेना चाहिए कि जन्मदिवस, विवाह, जनेऊ जैसे सभी संस्कार एवं पर्व भारतीय परंपराओं के अनुरूप मनाए जाएं—भोजन, वेशभूषा, आमंत्रण पत्र और रीतिरिवाज सभी पूरी तरह स्वदेशी पद्धति पर आधारित हों।”
उनके इस विचार पर उपस्थित मातृ शक्तियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सहमति जताई।
महापुरुषों के निर्माण में मातृ शक्ति की भूमिका
मुख्य अतिथि डॉ. पिंकी हार्डिया ने माताओं की भूमिका को समाज निर्माण का केंद्र बिंदु बताया। उन्होंने कहा कि सभी युगों में महान व्यक्तित्वों के पीछे एक दृढ़, संस्कारित और दूरदर्शी माता का हाथ रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चाहे राम हों, कृष्ण हों, शिवाजी हों या स्वामी विवेकानंद—हर महापुरुष के पीछे एक सशक्त मातृ शक्ति ने ही उनके चरित्र, व्यक्तित्व और संस्कार गढ़े।
“समाज में परिवर्तन की नींव मां ही रखती है। वही प्रथम गुरु है, वही प्रेरणा है और वही राष्ट्र निर्माण की असली धुरी है।” —डॉ. हार्डिया

अपनी भाषा और मोबाइल उपवास का संदेश
विशेष अतिथि संगीता चौहान ने आधुनिक जीवनशैली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि डिजिटल युग में भाषा और लिपि का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों और माताओं से आग्रह किया कि वे मोबाइल, चैट, सोशल मीडिया और मैसेजिंग में अपनी भाषा का सम्मान करें।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सप्ताह में कम से कम एक दिन कुछ घंटे मोबाइल उपवास जरूर रखें, ताकि परिवारिक संवाद बढ़े और विद्यार्थी मानसिक रूप से शांत रहें।
“अपनी भाषा, अपनी लिपि और अपने संस्कार—यही हमारी पहचान हैं।” —संगीता चौहान
अतिथि सम्मान एवं आभार
कार्यक्रम की अध्यक्षता सह संपर्क प्रमुख ज्योति राठौर ने की।
अतिथियों का स्वागत विद्यालय की कार्यकर्त्री सुनीता, माया फणसे और पिंकी द्वारा किया गया।
आभार प्रदर्शन विद्यालय की प्रधानाचार्य मंजू प्रजापत ने किया, जिन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों और मातृ शक्तियों के बीच एक संस्कारपूर्ण वातावरण का निर्माण करते हैं।
निष्कर्ष
सप्त शक्ति संगम केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मातृ शक्ति को जागरूक, संगठित और संस्कारित करने का संदेश लेकर आया। भारतीय परंपराओं को जीवन में उतारने, अपनी भाषा को महत्व देने और आधुनिकता में संयम रखने के संदेश ने कार्यक्रम को सार्थक बना दिया। इंदौर में आयोजित यह संगम समाज को यह याद दिलाता है कि परिवार और राष्ट्र की मजबूत नींव माताएं ही तैयार करती हैं।


