Quick Highlights
- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार का बड़ा फैसला
- उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड होगा समाप्त
- 1 जुलाई 2026 से नए नियम लागू
- मान्यता प्राप्त न होने वाले मदरसों पर रोक
- गैर-अल्पसंख्यक छात्रों का नामांकन अधिकतम 15% तक सीमित
प्रस्तावना
उत्तराखंड की राजनीति और समाज में हाल के दिनों में कई बड़े फैसले सामने आए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एक बार फिर अपने सख्त निर्णयों की वजह से सुर्खियों में हैं। इस बार सरकार ने शिक्षा व्यवस्था, खासकर मदरसों को लेकर बड़ा कदम उठाया है। अब राज्य में 1 जुलाई 2026 के बाद वही मदरसे चल पाएंगे, जो सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करेंगे। धामी सरकार ने विधानसभा में ‘अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक, 2025’ पारित किया है, जिसके जरिए मदरसा बोर्ड को समाप्त कर दिया जाएगा और उसकी जगह एक नया अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया जाएगा।
मदरसों को लेकर सरकार का कदम क्यों अहम?
उत्तराखंड में लंबे समय से मदरसों की व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं। राज्य सरकार की हालिया जांच में सामने आया था कि प्रदेश में करीब 700 से ज्यादा मदरसों की जांच की गई, जिनमें से लगभग 270 मदरसे अपंजीकृत पाए गए। न तो वे शिक्षा विभाग की गाइडलाइन का पालन कर रहे थे और न ही उनका संचालन किसी पंजीकृत संस्था के तहत हो रहा था। ऐसे में धामी सरकार ने साफ कर दिया कि शिक्षा के नाम पर किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
नया कानून और उसकी शर्तें
नए विधेयक के अनुसार, 1 जुलाई 2026 से केवल वे मदरसे ही चल पाएंगे जो सरकार की शर्तें मानेंगे। इन शर्तों में शामिल हैं:
- मदरसा किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित होना चाहिए।
- संचालक का जुड़ाव किसी पंजीकृत संस्था (सोसायटी, न्यास या कंपनी) से होना अनिवार्य होगा।
- गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों का नामांकन 15% से अधिक नहीं होना चाहिए।
- पाठ्यक्रम में सरकार द्वारा निर्धारित शिक्षा शामिल करना अनिवार्य होगा, ताकि बच्चों को मुख्यधारा की पढ़ाई से जोड़ा जा सके।
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की भूमिका
धामी सरकार ने यह भी तय किया है कि मदरसा बोर्ड को भंग कर एक नया निकाय बनाया जाएगा—उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण। यह प्राधिकरण मदरसों की मान्यता, संचालन और शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी करेगा। इसका उद्देश्य है कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को आधुनिक शिक्षा और करियर के अवसर भी मिल सकें।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
इस फैसले पर जहां भाजपा समर्थक इसे “शिक्षा सुधार का साहसिक कदम” बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों और कुछ संगठनों ने इसे अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बताया है। उनका तर्क है कि इससे पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था पर असर पड़ेगा और कई गरीब बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट सकती है। हालांकि सरकार का कहना है कि “यह कदम किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए है।”
पहले भी हो चुकी है सख्ती
यह पहली बार नहीं है जब धामी सरकार ने मदरसों पर सख्ती दिखाई है। पिछले साल भी मुख्यमंत्री ने सभी जिलों में मदरसों की जांच के आदेश दिए थे। नतीजा यह रहा कि बड़ी संख्या में मदरसे बिना पंजीकरण के पाए गए। कई संस्थाओं में पढ़ाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही थी। ऐसे मामलों में सरकार ने नोटिस जारी किए और अब सीधे कानून बनाकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।
बच्चों के भविष्य पर असर
धामी सरकार का कहना है कि यह फैसला बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया है। सरकार चाहती है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे भी आधुनिक शिक्षा, कंप्यूटर, विज्ञान और गणित जैसे विषयों से जुड़े रहें ताकि आगे चलकर उन्हें नौकरी और करियर के अवसर मिल सकें। सिर्फ धार्मिक शिक्षा तक सीमित रहना बच्चों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
Quick Analysis
- इस फैसले से अपंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों पर तुरंत असर पड़ेगा।
- नए कानून से मदरसों को पारदर्शिता और जवाबदेही की ओर बढ़ना होगा।
- बच्चों के लिए आधुनिक और मुख्यधारा की शिक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
- हालांकि, इस कदम से कुछ संगठनों का विरोध भी सामने आ सकता है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड की धामी सरकार का यह कदम शिक्षा सुधार की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है। मदरसों पर लगाम कसने और उन्हें सरकारी ढांचे के अंतर्गत लाने से बच्चों को बेहतर भविष्य की गारंटी दी जा सकती है। हालांकि, यह भी सच है कि हर बड़ा बदलाव अपने साथ विरोध और विवाद लेकर आता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नया कानून वास्तव में शिक्षा व्यवस्था को कितना सुधार पाता है और अल्पसंख्यक समुदाय इसे किस तरह स्वीकार करता है।
कुल मिलाकर, धामी सरकार का यह फैसला साफ संदेश देता है—‘शिक्षा सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसे समय और समाज की जरूरतों के मुताबिक ढलना होगा।’

