कर्नाटक की राजनीति में इस वक्त सबसे ज़्यादा चर्चा जिस घटना की हो रही है, वह है उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार द्वारा विधानसभा में अचानक आरएसएस का गीत गाना।( RSS गीत कर्नाटक विधानसभा) गुरुवार (22 अगस्त 2025) को हुई इस घटना ने न सिर्फ सदन में मौजूद विधायकों को हैरान कर दिया बल्कि पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी।
दरअसल, विधानसभा में बहस के दौरान जब विपक्षी दल बीजेपी ने सरकार पर सवाल उठाए, तो शिवकुमार ने जवाब देते हुए अचानक “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे”—आरएसएस की प्रसिद्ध प्रार्थना—की पंक्तियाँ गा दीं। जैसे ही ये शब्द उनके मुंह से निकले, कांग्रेस विधायकों से लेकर बीजेपी के नेताओं तक सभी चौंक उठे। सदन में एक पल को सन्नाटा छा गया और फिर शोर-शराबा मच गया।
विधानसभा में क्यों गूंजा RSS गीत?
शिवकुमार का यह बयान तब आया जब बीजेपी विधायकों ने उन्हें घेरने की कोशिश की। विपक्ष ने चिन्नास्वामी स्टेडियम में हाल ही में हुई भगदड़ की घटना का मुद्दा उठाया और सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े किए। इसके जवाब में शिवकुमार ने अपने राजनीतिक जीवन और अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने विभिन्न संगठनों—चाहे वह आरएसएस हो, बीजेपी हो या जनता दल—सभी पर अध्ययन किया है।
इसी सिलसिले में उन्होंने उदाहरण देते हुए अचानक आरएसएस की प्रार्थना गा दी। हालांकि उन्होंने इसे किसी राजनीतिक झुकाव का संकेत नहीं बताया, लेकिन जैसे ही गीत की पंक्तियाँ सदन में गूंजी, माहौल गरमा गया।
बीजेपी का पलटवार और कांग्रेस में खलबली
बीजेपी विधायकों ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया दी और तंज कसा कि कांग्रेस के नेता भी अब आरएसएस की विचारधारा की ओर झुकने लगे हैं। विपक्ष ने इसे कांग्रेस की विचारधारा में कमजोरी और ‘हिंदुत्व के प्रभाव’ का सबूत बताया।
दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में इस घटना ने असहज स्थिति पैदा कर दी। पार्टी के कुछ नेताओं ने निजी तौर पर माना कि शिवकुमार को ऐसा कदम उठाने से बचना चाहिए था, क्योंकि इससे गलत संदेश गया। वहीं कांग्रेस समर्थकों का एक वर्ग यह मानता है कि शिवकुमार ने महज़ राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर यह गीत गाया था, जिसे बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
डीके शिवकुमार का स्पष्टीकरण
इस घटना के बाद मीडिया ने जब शिवकुमार से पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा—
“मैं जन्मजात कांग्रेसी हूं। कांग्रेस ही मेरा घर है और कांग्रेस में ही मेरी राजनीति आगे बढ़ेगी। मैंने किसी दूसरी पार्टी में जाने का सपना तक नहीं देखा।”
उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने राजनीतिक जीवन में विपक्षी दलों और उनके संगठनों पर अध्ययन किया है। “मैंने जनता दल देखा, बीजेपी देखा, आरएसएस देखा। यह सब इसलिए ताकि मैं समझ सकूं कि हमारे मित्र कौन हैं और विरोधी कौन। यह मेरी रिसर्च का हिस्सा है, न कि किसी विचारधारा में बदलाव का संकेत।”
सोशल मीडिया पर बवाल
जैसे ही विधानसभा का यह वीडियो वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर जमकर चर्चा शुरू हो गई। ट्विटर और फेसबुक पर लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर कांग्रेस का एक वरिष्ठ नेता विधानसभा में आरएसएस का गीत क्यों गा रहा है।
- बीजेपी समर्थकों ने इसे “कांग्रेस की विचारधारा की हार” बताया।
- जबकि कांग्रेस समर्थक कहने लगे कि शिवकुमार ने विपक्ष को आईना दिखाने के लिए यह कदम उठाया।
इस वीडियो पर हजारों प्रतिक्रियाएँ आ चुकी हैं और यह ट्रेंडिंग टॉपिक बना हुआ है।
राजनीतिक संदेश और भविष्य की रणनीति
विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार का यह कदम एक रणनीतिक चाल भी हो सकता है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार है और शिवकुमार खुद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी रखने वाले नेता माने जाते हैं। ऐसे में उनकी हर बात पर मीडिया और विपक्ष की नज़र रहती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शिवकुमार भले ही इसे रिसर्च और विपक्ष के उदाहरण के तौर पर बता रहे हों, लेकिन इससे एक बात साफ होती है कि कांग्रेस नेताओं को भी अब हिंदुत्व की राजनीति को लेकर सावधानी बरतनी पड़ रही है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीति में संदेश जल्दी फैलते हैं और विपक्ष इन्हें हथियार बनाता है।
विपक्ष को मिला नया मुद्दा
बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को यहीं खत्म नहीं होने देगी। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ही आरएसएस की प्रार्थना गाने लगें, तो इसका मतलब है कि कांग्रेस भी संगठन की ताकत को मानने लगी है।
वहीं, कांग्रेस इस घटना को हल्का बताने की कोशिश कर रही है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि शिवकुमार ने यह गीत किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं गाया था। लेकिन विपक्ष इस तर्क को मानने को तैयार नहीं है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, कर्नाटक विधानसभा में डी.के. शिवकुमार द्वारा आरएसएस का गीत गाने की घटना ने एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। यह महज़ एक पल का बयान था या एक गहरी राजनीतिक रणनीति—इस पर फिलहाल राय बंटी हुई है।
शिवकुमार ने भले ही खुद को “जन्मजात कांग्रेसी” बताया हो और किसी भी तरह की पार्टी बदलने की अफवाहों को खारिज कर दिया हो, लेकिन इस घटना ने यह तो साफ कर दिया है कि भारतीय राजनीति में प्रतीकों और संकेतों की अहमियत बहुत बड़ी होती है।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि आने वाले दिनों में यह घटना विपक्ष के लिए हथियार बनेगी और कांग्रेस के लिए असहज सवाल खड़े करेगी। कर्नाटक की राजनीति में इस गीत की गूंज लंबे समय तक सुनाई देने वाली है।

