(SCO Summit 2025) भारत और चीन के रिश्ते हमेशा से ही उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। कभी व्यापार और सहयोग की बातें होती हैं तो कभी सीमा विवाद इन रिश्तों में खटास घोल देता है। लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा बयान देकर आने वाले समय की दिशा तय कर दी है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात से पहले पीएम मोदी ने साफ कहा है कि भारत आपसी सम्मान, साझा हितों और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाने को तैयार है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया बहुध्रुवीय (multi-polar) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और एशिया की भूमिका और भी अहम होती जा रही है।
पीएम मोदी का संदेश और उसका महत्व
जापान दौरे के दौरान दिए गए इस इंटरव्यू में पीएम मोदी ने कहा कि भारत और चीन, दोनों ही बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और अगर ये आपसी विश्वास और सम्मान के साथ आगे बढ़ें तो न सिर्फ एशिया बल्कि पूरी दुनिया को स्थिरता और मजबूती मिलेगी। मोदी का यह बयान इस बात का संकेत है कि भारत सिर्फ टकराव नहीं, बल्कि सहयोग को प्राथमिकता देना चाहता है।
उन्होंने यह भी कहा कि रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए आपसी संवेदनशीलता (mutual sensitivity) जरूरी है। यानी भारत यह संदेश देना चाहता है कि सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और सुरक्षा चिंताओं जैसे मुद्दों को हल किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
सीमा विवाद की पृष्ठभूमि
भारत-चीन संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती सीमा विवाद रहा है। 2020 में गलवान घाटी की झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार डाल दी थी। उसके बाद से दोनों देशों की सेनाएं कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएं कर चुकी हैं। कुछ इलाकों में डिसएंगेजमेंट हुआ है, लेकिन पूर्ण समाधान अभी भी अधूरा है।
पीएम मोदी का यह बयान उसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। दरअसल, भारत अब यह दिखाना चाहता है कि वह टकराव नहीं चाहता, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता भी नहीं करेगा।
वैश्विक संदर्भ: अमेरिका, जापान और SCO
यह बयान सिर्फ भारत-चीन रिश्तों तक सीमित नहीं है। वैश्विक राजनीति में इसका बड़ा महत्व है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और तकनीकी वर्चस्व की लड़ाई तेज हो चुकी है। वहीं, जापान और फिलीपींस जैसे एशियाई देश भी चीन की आक्रामक नीतियों से चिंतित हैं।
भारत इस समय एक संतुलन साधने की भूमिका में है। एक ओर वह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड (QUAD) में सक्रिय है, वहीं दूसरी ओर शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में चीन और रूस के साथ भी खड़ा है। मोदी का यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि आने वाले दिनों में भारत और चीन की मुलाकात SCO शिखर सम्मेलन के दौरान होनी है, जहां कई मुद्दों पर बातचीत संभव है।
आर्थिक रिश्तों की अहमियत
राजनीतिक और रणनीतिक मतभेदों के बावजूद भारत और चीन के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। 2023-24 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 135 अरब डॉलर से अधिक का रहा। हालांकि इसमें असंतुलन साफ दिखता है क्योंकि भारत चीन से कहीं ज्यादा सामान आयात करता है।
मोदी का बयान इस दृष्टि से भी अहम है कि भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) में स्थिरता चाहता है। कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह दिखा दिया है कि दुनिया अब सिर्फ एक देश पर निर्भर रहकर नहीं चल सकती। अगर भारत और चीन सहयोग करें तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सकती है।
भारत का संदेश: सहयोग, लेकिन बराबरी के आधार पर
पीएम मोदी के शब्दों में साफ झलकता है कि भारत रिश्तों में बराबरी चाहता है। यानी कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें एक पक्ष हावी हो और दूसरा दबे। भारत चाहता है कि चीन उसकी चिंताओं को भी उतनी ही गंभीरता से सुने जितनी वह अपनी बातों को रखता है।
इसका मतलब यह भी है कि भारत अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखेगा। वह पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी भी करेगा और चीन व रूस जैसे देशों के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते भी खुले रखेगा।
आने वाले दिनों की संभावनाएँ
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बयान के बाद भारत-चीन रिश्ते किस दिशा में जाएंगे।
- सीमा विवाद पर प्रगति – अगर दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थायी समाधान की ओर बढ़ते हैं तो रिश्तों में सुधार का रास्ता खुल सकता है।
- आर्थिक सहयोग – भारत मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा दे रहा है। अगर चीन इसमें निवेश करता है या व्यापार संतुलन में सुधार करता है तो रिश्ते मजबूत हो सकते हैं।
- वैश्विक मंचों पर साझेदारी – जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और वैश्विक वित्तीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर भारत और चीन साथ आते हैं तो इनकी आवाज और भी मजबूत हो जाएगी।

निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह वैश्विक राजनीति में एक जिम्मेदार शक्ति है, जो टकराव नहीं बल्कि सहयोग चाहती है। लेकिन यह सहयोग किसी भी कीमत पर नहीं होगा—बल्कि आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और साझा हितों के आधार पर ही संभव है।
अगर चीन इस संदेश को सही मायने में समझता है और सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर सकारात्मक रवैया अपनाता है, तो एशिया ही नहीं पूरी दुनिया एक स्थिर और संतुलित भविष्य की ओर बढ़ सकती है। लेकिन अगर बीजिंग पुराने रवैये पर कायम रहा तो रिश्ते सीमित और सतर्क बने रहेंगे।
कुल मिलाकर, मोदी का यह बयान भारत की आत्मविश्वास भरी विदेश नीति का परिचायक है—जहां भारत अब किसी के दबाव में नहीं बल्कि अपने शर्तों पर रिश्तों को परिभाषित करने के लिए तैयार है।

