बीती रात अफगानिस्तान की धरती ने एक बार फिर भयावह झटका महसूस किया।(Earthquake in Afghanistan) 6.0 से अधिक तीव्रता वाले इस भूकंप का केंद्र पूर्वी अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत के पास बताया जा रहा है। धरती के भीतर लगभग 8–10 किलोमीटर गहराई में उत्पन्न हुई हलचल ने देखते ही देखते पूरे इलाके को हिला दिया। रात का सन्नाटा अचानक चीख-पुकार में बदल गया।
इस भूकंप का असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहा। पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके, यहां तक कि भारत की राजधानी दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी हल्के झटके महसूस किए गए। हालांकि भारत और पाकिस्तान में जान-माल की बड़ी हानि की खबर नहीं आई, लेकिन अफगानिस्तान में इसका असर बेहद भयावह रहा।
तबाही का मंजर: टूटे मकान, बिखरे घरौंदे
भूकंप के बाद जब सुबह की रोशनी फैली तो चारों ओर बर्बादी का दृश्य था। सैकड़ों घर मिट्टी में मिल चुके थे, कई गांव पूरी तरह बर्बाद नज़र आए। ग्रामीण इलाकों में कच्चे मकानों के ढहने से मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, अब तक 600 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 1,300 से ज्यादा लोग घायल हैं। कई इलाकों में अभी भी मलबे के नीचे दबे लोगों के जिंदा होने की संभावना जताई जा रही है। यही वजह है कि राहत और बचाव दल दिन-रात मलबा हटाने में जुटे हैं।

भारत और पाकिस्तान में भी दहशत
दिल्ली-NCR, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे इलाकों में रात करीब 11 बजे लोग अचानक घरों से बाहर निकल आए। सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें लोग अपने घरों से सड़क पर भागते नजर आए। पाकिस्तान के इस्लामाबाद और पेशावर जैसे शहरों में भी झटकों ने लोगों की नींद उड़ा दी।
हालांकि इन दोनों देशों में किसी गंभीर क्षति की खबर नहीं मिली है। लेकिन अफगानिस्तान की हालत यह साबित करती है कि क्षेत्र भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए बेहद संवेदनशील है।
राहत-बचाव में मुश्किलें
अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति और राजनीतिक हालात राहत कार्य को और भी कठिन बना रहे हैं। पहाड़ी इलाकों और टूटी सड़कों की वजह से कई जगहों तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल है। तालिबान सरकार ने सेना और स्थानीय एजेंसियों को राहत कार्य में लगाया है। हेलिकॉप्टर और छोटे हवाई जहाजों की मदद से दवाइयां, खाने-पीने का सामान और अस्थायी टेंट प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाए जा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी तुरंत मदद का ऐलान किया है। भारत ने भी मानवीय सहायता भेजने की पेशकश की है। मेडिकल टीमों और राहत सामग्री तैयार रखी गई है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर तुरंत भेजी जा सके।
पीड़ितों की दास्तान
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई परिवार रात को सो रहे थे और अचानक मकान ढह गया। कुछ जगहों पर पूरे-के-पूरे परिवार मलबे में दब गए। बच्चों और बुजुर्गों की चीखें सुनकर स्थानीय लोग भी बिना किसी संसाधन के अपने स्तर पर मदद में जुट गए।
कई गांवों में लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं। डर इस बात का भी है कि कहीं आफ्टरशॉक्स (भूकंप के दोबारा झटके) फिर से न आएं।
विशेषज्ञों की चेतावनी
भूकंप विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदूकुश पर्वत क्षेत्र और अफगानिस्तान का पूर्वी हिस्सा लगातार भूकंपीय गतिविधियों के लिए जाना जाता है। यहां की भूगर्भीय संरचना इतनी अस्थिर है कि मामूली हलचल भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में छोटे-छोटे आफ्टरशॉक्स आते रह सकते हैं। लोगों से अपील की गई है कि वे पक्के मकानों से दूर रहें और खुले स्थानों पर ठहरें।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
इस आपदा के बाद पूरी दुनिया से अफगानिस्तान के लिए संवेदनाएं और मदद की पेशकश आ रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने गहरी संवेदना जताई और प्रभावित परिवारों की मदद के लिए आपात राहत पैकेज का ऐलान किया। पाकिस्तान और भारत ने भी एकजुट होकर कहा है कि मानवता के इस संकट की घड़ी में राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर मदद पहुंचाना सबसे जरूरी है।
निष्कर्ष
अफगानिस्तान के लिए यह आपदा किसी गहरी चोट से कम नहीं है। एक ओर राजनीतिक अस्थिरता, दूसरी ओर आर्थिक तंगी और अब यह प्राकृतिक कहर — आम लोगों के लिए हालात बेहद कठिन हैं।
भारत और पाकिस्तान में भले ही जान-माल की हानि कम हुई हो, लेकिन इस भूकंप ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि धरती के इन हिस्सों में रहना कितना जोखिम भरा है। ऐसे हादसों से बचाव संभव नहीं है, लेकिन तैयारी और आपसी सहयोग के जरिए नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है।
अभी सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि प्रभावित लोगों तक जल्दी से जल्दी राहत पहुंचे और जो बेघर हो गए हैं, उन्हें अस्थायी छत और भोजन मिले। अंतरराष्ट्रीय मदद और मानवीय एकजुटता ही इस वक्त अफगानिस्तान के जख्मों पर मरहम का काम कर सकती है।

