मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बार फिर से सरकारी बंगलों पर कब्ज़े का मामला सुर्खियों में है। भोपाल सरकारी बंगले विवाद में तीन जिलों के कलेक्टरों समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप है कि वे तबादले के बाद भी भोपाल के सरकारी आवासों में जमे हुए हैं। गृह विभाग ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि सभी अधिकारी तत्काल प्रभाव से अपने-अपने सरकारी बंगले खाली करें, अन्यथा उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मामला क्या है?
सूत्रों के अनुसार, दमोह, उमरिया और मंदसौर जिलों के कलेक्टरों ने अपने-अपने पदस्थापना स्थानों पर आवास आवंटित होने के बावजूद भोपाल में स्थित सरकारी बंगलों को खाली नहीं किया है। यही नहीं, उनके अलावा भी कई वरिष्ठ अधिकारी स्थानांतरण के बाद भी राजधानी के आवासों का उपयोग कर रहे हैं।
जिन अधिकारियों पर आरोप लगा है, उनमें दमोह कलेक्टर सुधीर कोचर, उमरिया कलेक्टर धरेंद्र कुमार जैन, मंदसौर कलेक्टर अदिति गर्ग के नाम प्रमुख हैं। इनके अलावा उज्जैन के अपर आयुक्त रत्नाकर झा, रायसेन की अपर कलेक्टर श्वेता पवार, राजगढ़ के सीईओ महीप तेजस्वी, ग्वालियर के डीआईजी अमित सांघी, ग्वालियर की अपर आयुक्त निधि सिंह, इंदौर के डीएसपी उमाकांत चौधरी और रीवा के सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर भी भोपाल में सरकारी मकानों पर कब्जा जमाए बैठे हैं।
सरकार का रुख
गृह विभाग ने एस्टेट विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि इन सभी अधिकारियों को नोटिस जारी कर तुरंत बंगले खाली कराए जाएं। सरकार का मानना है कि राजधानी भोपाल में कई अधिकारी व कर्मचारी हैं जिन्हें सरकारी आवास की ज़रूरत है, लेकिन पुराने अधिकारी कब्जा जमाए बैठे हैं, जिससे दिक्कतें बढ़ रही हैं।
सूत्रों का कहना है कि सरकार ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि नोटिस के बावजूद बंगले खाली नहीं किए गए तो न केवल जबरन कब्जा हटाया जाएगा, बल्कि अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाएगी।
पृष्ठभूमि: पहले भी उठ चुका है विवाद
भोपाल में सरकारी मकानों पर कब्ज़ा कोई नई बात नहीं है। बीते साल 2023 में भी डिप्टी कलेक्टर निशा बांगरे के मामले ने सुर्खियां बटोरी थीं। तब उनसे भी तत्काल बंगला खाली करने को कहा गया था। हालांकि उन्होंने कुछ मोहलत मांगी और बाद में आवास छोड़ दिया।
यह प्रकरण इस बात को उजागर करता है कि राजधानी में अक्सर उच्च अधिकारी स्थानांतरण के बाद भी बंगलों को छोड़ने से बचते हैं। इससे नए अधिकारियों को आवास आवंटन में दिक्कतें आती हैं और विभागीय कामकाज पर भी असर पड़ता है।
क्यों अहम है यह मुद्दा?
राजधानी भोपाल में सरकारी बंगलों की संख्या सीमित है। यहां रहने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों को इन्हीं मकानों में जगह दी जाती है। लेकिन जब पहले से ही खाली करवाने में ढिलाई होती है, तो नए पदस्थ अधिकारी आवास से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि या तो उन्हें किराए के मकानों का सहारा लेना पड़ता है या फिर अस्थायी आवास में रहना पड़ता है।
इसके अलावा, सरकारी बंगलों पर लंबे समय तक कब्जा जमाए रखने को लेकर यह सवाल भी उठता है कि क्या अधिकारी अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। यही वजह है कि सरकार ने इस बार सख्त कार्रवाई का रुख अपनाया है।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
हालांकि संबंधित अधिकारियों की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि कुछ अधिकारी “परिवार की पढ़ाई” और “सुविधा” जैसे कारणों का हवाला देकर राजधानी में आवास बनाए रखना चाहते हैं। वहीं, कई लोग इसे सीधे-सीधे “नियमों का उल्लंघन” मान रहे हैं।
जनता और कर्मचारियों की नाराज़गी
सरकारी कर्मचारी संगठनों का कहना है कि आम कर्मचारी के लिए मकान हासिल करना बेहद मुश्किल होता है। अगर कोई छोटा कर्मचारी अवैध कब्जा करे तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े अधिकारियों के मामले में अक्सर चुप्पी साध ली जाती है। यही वजह है कि अब आम कर्मचारियों और जनता में नाराज़गी देखने को मिल रही है।
आगे क्या होगा?
गृह विभाग ने साफ कर दिया है कि सभी अधिकारियों को तत्काल बंगले खाली करने होंगे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो एस्टेट विभाग जबरन कब्जा हटाएगा। साथ ही, विभागीय कार्रवाई भी संभव है। यह कदम सरकार की सख्ती का संकेत है कि अब नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
निष्कर्ष
भोपाल में सरकारी बंगलों पर कलेक्टरों और वरिष्ठ अधिकारियों का कब्ज़ा प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है। जब नियम बनाने वाले ही नियम तोड़ने लगें तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है। सरकार का यह आदेश साफ संदेश देता है कि अब चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अधिकारी स्वेच्छा से बंगले खाली करते हैं या सरकार को कठोर कार्रवाई करनी पड़ती है।

