दक्षिण एशिया इस समय राजनीतिक उथल-पुथल और जनाक्रोश की गिरफ्त में है। भारत के पांच अहम पड़ोसी—नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार—लगातार विरोध-प्रदर्शनों और सत्ता संकट से गुजर रहे हैं। जनता की नाराज़गी, महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने सड़कों पर उबाल ला दिया है। हालात इतने बिगड़े कि कहीं सरकार गिरी, तो कहीं सेना को काबू करने के लिए मैदान में उतरना पड़ा।
नेपाल: युवाओं का गुस्सा और पीएम का इस्तीफा
नेपाल में हाल ही में हालात अचानक बिगड़ गए। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से ने युवा वर्ग को सड़कों पर उतार दिया। काठमांडू में हालात इतने बेकाबू हुए कि सरकारी इमारतों और होटलों में आगजनी तक हो गई। विरोध-प्रदर्शनों में करीब 19 लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों घायल हैं।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा। राजधानी में कर्फ्यू लगा हुआ है और सेना अब हालात संभालने की कोशिश कर रही है। भारत-नेपाल सीमा पर भी हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है ताकि अस्थिरता का असर भारतीय इलाकों तक न फैले।
बांग्लादेश: छात्र आंदोलन से गिरी सरकार
भारत का एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश बीते साल भारी राजनीतिक संकट से गुज़रा। वहां के छात्र संगठनों ने बेरोज़गारी और सरकारी नीतियों के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। यह विरोध इतना व्यापक हुआ कि लंबे समय से सत्ता पर काबिज़ रही शेख हसीना सरकार को देश छोड़ना पड़ा।
छात्र-आंदोलन ने साफ संदेश दिया कि जनता अब तानाशाही या भ्रष्ट व्यवस्था को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आज बांग्लादेश में अस्थायी सरकार है, लेकिन राजनीतिक स्थिरता अभी भी दूर की कौड़ी है।
पाकिस्तान: इमरान खान की गिरफ्तारी और हिंसा
पाकिस्तान में भी हालात अच्छे नहीं हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी ने पूरे देश में बवाल खड़ा कर दिया। जगह-जगह प्रदर्शन हुए, सरकारी दफ्तरों और सेना की इमारतों पर हमले हुए। हालात बेकाबू होते देख सरकार को इंटरनेट बंद करना पड़ा और कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया।
पाकिस्तान पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहा है—महंगाई चरम पर है और विदेशी कर्ज़ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता ने देश की स्थिति और खराब कर दी है।
श्रीलंका: आर्थिक संकट से उपजा जनाक्रोश
श्रीलंका का संकट एशिया के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं था। 2022 में महंगाई, ईंधन की कमी और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई। “अरगलाया आंदोलन” ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
हजारों लोग कोलंबो में राष्ट्रपति भवन तक घुस गए थे। इस आंदोलन ने दिखाया कि जब जनता का गुस्सा चरम पर पहुंचता है तो सत्ता के बड़े-बड़े किले भी ढह जाते हैं। हालांकि अब वहां नई सरकार है, लेकिन आर्थिक हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं।
म्यांमार: सेना बनाम जनता
भारत का पड़ोसी म्यांमार 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से ही संघर्ष में उलझा हुआ है। सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। इसके बाद से लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं।
युवाओं से लेकर आम नागरिक और भिक्षु तक सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन सेना की कठोर कार्रवाई और मीडिया पर पाबंदियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। लोकतंत्र की बहाली अभी भी दूर लगती है और देश लगातार अशांति में डूबा हुआ है।
भारत पर असर
पड़ोसी देशों की यह अस्थिरता भारत के लिए भी चिंता का विषय है।
- नेपाल में उपद्रव बढ़ने से उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर सुरक्षा कड़ी करनी पड़ी है।
- बांग्लादेश और पाकिस्तान की उथल-पुथल का असर भारत की पूर्वोत्तर और पश्चिमी सीमाओं पर पड़ सकता है।
- श्रीलंका की आर्थिक तंगी के समय भारत को लगातार मदद भेजनी पड़ी।
- म्यांमार का संकट भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर असर डाल रहा है।
भारत एक बड़े क्षेत्रीय शक्ति के रूप में शांति और स्थिरता चाहता है, लेकिन लगातार पड़ोस में उठ रहे तूफान नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।
निष्कर्ष
दक्षिण एशिया की मौजूदा तस्वीर काफी धुंधली और अस्थिर नज़र आती है। नेपाल में युवाओं का गुस्सा, बांग्लादेश में छात्र आंदोलन, पाकिस्तान की राजनीतिक लड़ाई, श्रीलंका की आर्थिक तबाही और म्यांमार का सैन्य संकट—ये सब मिलकर बता रहे हैं कि जनता अब चुप रहने के मूड में नहीं है।
भारत के लिए यह समय सावधानी और सतर्कता का है। पड़ोस की अस्थिरता कहीं सुरक्षा या आर्थिक मोर्चे पर असर न डाले, इसके लिए कूटनीतिक और मानवीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
यह साफ है कि दक्षिण एशिया का भविष्य तभी सुरक्षित हो पाएगा जब इन देशों में जनता की आवाज़ को सही मायनों में सुना और समझा जाएगा।

