देश में दो नए बैंक लाने की तैयारी : भारत सरकार अब वित्तीय क्षेत्र ( Financial sector ) को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। खबर है कि केंद्र सरकार ने ऐसी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है जिसके तहत देश में दो ऐसे बैंक वजूद में लाए जाएंगे जो न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था ( indian economy ) की ज़रूरतों को पूरा करेंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान बनाएंगे। लक्ष्य यह है कि आने वाले वर्षों में भारत के कम से कम दो बैंक विश्व के शीर्ष 20 बैंकों की सूची में शामिल हों।
पृष्ठभूमि और सरकार का विजन
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र ( banking sector )में कई अहम सुधार किए हैं। पब्लिक सेक्टर बैंकों के मर्जर से लेकर तकनीकी सुधारों तक, सरकार का उद्देश्य हमेशा यह रहा है कि भारतीय बैंक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनें। इसी कड़ी में हाल ही में “PSB Manthan 2025” नामक बैठक में यह विचार सामने रखा गया कि देश को ऐसे बड़े बैंकों की आवश्यकता है जो विश्व स्तर पर अपनी जगह बना सकें।
सरकार का दीर्घकालिक विजन “विकसित भारत 2047” है, जिसके तहत भारत को न सिर्फ आर्थिक महाशक्ति बनाना है बल्कि बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और तकनीक के क्षेत्र में भी अग्रणी स्थान दिलाना है। इस योजना के तहत उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले वर्षों में दो भारतीय बैंक दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत बैंकों की सूची में शुमार होंगे।
क्या होंगे ये नए बैंक?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये बैंक पूरी तरह नए होंगे या मौजूदा बैंकों के पुनर्गठन और विस्तार से तैयार होंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार अभी इस पर विचार कर रही है और किसी तरह का अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। फिलहाल यह साफ किया गया है कि मर्जर यानी विलय को मजबूरी नहीं बनाया जाएगा, बल्कि कोशिश होगी कि बैंक स्वाभाविक रूप से अपने आकार और क्षमता के दम पर बड़े बनें।
इसका मतलब यह है कि मौजूदा बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जैसे एसबीआई (SBI), पीएनबी (PNB), बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) आदि को अधिक संसाधन, तकनीकी सहयोग और नीतिगत सहूलियत देकर उन्हें वैश्विक स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि योजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन चुनौतियों से भरी हुई भी है। भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लंबे समय से एनपीए (Non Performing Assets) यानी बकाया कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ा है। कई बार राजनीतिक दबाव और नीतिगत जटिलताओं के चलते बैंक अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए सिर्फ पूंजी ही नहीं बल्कि आधुनिक तकनीक, डिजिटल बैंकिंग सुविधाएं, साइबर सुरक्षा, और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना भी जरूरी है। ऐसे में सरकार को बैंकों को अधिक स्वायत्तता देने और उनके बोर्ड को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
क्यों है इसकी ज़रूरत?
भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अगर भारत को 2047 तक विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होना है तो उसके बैंकिंग ढांचे को भी उसी स्तर का बनाना होगा। फिलहाल चीन के कई बैंक दुनिया के शीर्ष 20 बैंकों की सूची में शामिल हैं, जबकि भारत का कोई भी बैंक इस सूची में जगह नहीं बना पाया है।
इसलिए, सरकार चाहती है कि आने वाले समय में भारत के पास भी ऐसे बैंक हों जो न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और फाइनेंशियल मार्केट्स में भी प्रभावी भूमिका निभा सकें।
विशेषज्ञों की राय
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार सही दिशा में ठोस कदम उठाती है तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बैंकिंग सुधारों को राजनीति से दूर रखकर पूरी तरह प्रोफेशनल तरीके से लागू किया जाए। साथ ही, बैंकों को अपने कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने और ग्राहकों को विश्वस्तरीय सेवाएं देने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
भविष्य की तस्वीर
अगर यह योजना सफल होती है तो आने वाले दशक में भारत के पास दो ऐसे बैंक होंगे जो वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक ताकत का चेहरा बनेंगे। इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा और भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी।
सरकार की इस पहल से यह भी साफ होता है कि आने वाले वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। यह बदलाव न सिर्फ बैंकों तक सीमित रहेंगे बल्कि आम जनता को भी बेहतर सेवाओं, आसान लोन और आधुनिक सुविधाओं का फायदा मिलेगा।
निष्कर्ष
भारत सरकार ने अब यह ठान लिया है कि देश की आर्थिक प्रगति को नई ऊंचाई देने के लिए बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत करना जरूरी है। “दो नए बड़े बैंक” की योजना सिर्फ बैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है। हालांकि चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन अगर सुधारों को सही तरीके से लागू किया गया तो आने वाले समय में भारत भी उन देशों की कतार में खड़ा होगा जिनके बैंक वैश्विक वित्तीय जगत में सबसे मजबूत माने जाते हैं।

