भारत और पाकिस्तान ( IND Vs PAK ) के बीच हर क्रिकेट मुकाबला केवल खेल नहीं होता, बल्कि भावनाओं का तूफ़ान लेकर आता है। एशिया कप 2025 ( Asia cup 2025 ) में जब भारत-पाकिस्तान मैच की घोषणा हुई, तो आम क्रिकेट प्रेमियों में उत्साह देखने को मिला। लेकिन इस बीच, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले ( pahalgam terror attack )के पीड़ित परिवारों का दर्द फिर से उभर आया है। इन परिवारों ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक उनके घाव भरे नहीं हैं और ऑपरेशन सिंदूर ( Opration sindoor ) का उद्देश्य अधूरा है, तब तक पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना उन्हें एक “बेकार और दर्दनाक फैसला” लगता है।


पहलगाम हमला और दर्दनाक यादें

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पाहलगाम में हुए हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। आतंकियों ने टूरिस्ट बसों को निशाना बनाया और धर्म देखकर पर्यटकों पर गोलियां बरसा दीं। इस हमले में 26 निर्दोष लोग मारे गए, जिनमें 25 भारतीय और 1 नेपाली नागरिक शामिल थे। कई परिवार पलभर में उजड़ गए और अनगिनत लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

पीड़ितों का कहना है कि उस काले दिन की यादें अब भी उन्हें चैन से जीने नहीं देतीं। उनके घरों में आज भी मातम का माहौल है, लेकिन जब वो सुनते हैं कि भारत और पाकिस्तान क्रिकेट के मैदान में आमने-सामने होंगे, तो उन्हें लगता है कि उनकी पीड़ा को अनदेखा किया जा रहा है।


ऑपरेशन सिंदूर – उम्मीद और सवाल

हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और “ऑपरेशन सिंदूर” चलाया। सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और सीमावर्ती इलाकों में आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की। उस समय यह संदेश दिया गया था कि आतंकवाद की कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ेगी।

लेकिन अब जब भारत-पाकिस्तान मैच होने जा रहा है, तो हमले में अपनों को खोने वाले परिवारों का गुस्सा सामने आ रहा है। सावन परमार, जिनके पिता और भाई हमले में शहीद हुए थे, ने मीडिया से कहा –
“ऑपरेशन सिंदूर अब बेकार लगता है। जब हमारी तकलीफ़ का समाधान ही नहीं हुआ, दोषियों को खत्म नहीं किया गया, तो फिर यह सब केवल दिखावा लगता है।”


पीड़ितों का सवाल – मैच जरूरी या न्याय?

परिवारों का कहना है कि क्रिकेट और खेल अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन जब तक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाई जाती, तब तक खेल का कोई मतलब नहीं है। उनका सवाल है –
“क्या पाकिस्तान के साथ खेलना हमारी तकलीफों पर नमक छिड़कना नहीं है? क्या सरकार को पहले हमारे जख्मों पर मरहम नहीं लगाना चाहिए?”

उनकी मांग है कि सरकार और अंतरराष्ट्रीय खेल संगठन इस पर गंभीरता से विचार करें और जब तक आतंकवाद की समस्या खत्म नहीं होती, तब तक भारत-पाकिस्तान मैचों को टाल देना चाहिए।


सरकार और क्रिकेट बोर्ड पर दबाव

अब सवाल यह उठ रहा है कि इस मामले पर बीसीसीआई और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया क्या होगी। खेल जगत का एक हिस्सा मानता है कि क्रिकेट और राजनीति को अलग रखना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर, आम लोगों और पीड़ित परिवारों की भावनाएँ यह कहती हैं कि पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्ते तभी बहाल हों, जब वह आतंकवाद को रोकने की गारंटी दे।

बीते वर्षों में भी कई बार भारत-पाकिस्तान क्रिकेट सीरीज रद्द की गई है। केवल आईसीसी टूर्नामेंट्स जैसे विश्वकप या एशिया कप में ही दोनों टीमें भिड़ती हैं। इस बार भी विरोध की आवाज़ें उठने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मैच खेला जाना चाहिए या इसे स्थगित किया जाए।


जनता का मूड

सोशल मीडिया पर भी यही बहस छिड़ी हुई है। एक वर्ग कहता है कि क्रिकेट को क्रिकेट की तरह लेना चाहिए, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि शहीदों और पीड़ित परिवारों की भावनाएँ सर्वोपरि हैं। कई लोग लिख रहे हैं कि अगर सरकार ऑपरेशन सिंदूर जैसी सख्त कार्रवाई करती है, तो उसके बाद पाकिस्तान के साथ मैदान पर उतरना उस संदेश को कमजोर करता है।

opration sindoor

निष्कर्ष

पाहलगाम हमले के पीड़ितों का गुस्सा और उनका दर्द वाजिब है। उनके लिए भारत-पाकिस्तान मैच केवल एक खेल नहीं, बल्कि उनके घावों को ताजा करने वाली याद है। उनका सवाल है कि जब तक आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई पूरी नहीं होती, तब तक क्रिकेट जैसे आयोजनों का क्या औचित्य है।

सरकार और खेल संस्थाओं को अब इस विरोध को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह केवल खेल का मामला नहीं है, बल्कि उन परिवारों की संवेदनाओं का सवाल है जिन्होंने देश की सुरक्षा की कीमत अपने अपनों की जिंदगी देकर चुकाई है।

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