भोपाल। नवरात्रि की शुरुआत में ही राजधानी भोपाल में गरबा पंडालों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। संस्कृति बचाओ मंच और हिंदू उत्सव समिति ने आयोजकों को साफ संदेश दिया है कि गरबा केवल धार्मिक परंपरा और आस्था का हिस्सा बने, इसमें किसी भी तरह की “लव जिहाद” जैसी गतिविधियों के लिए जगह नहीं होगी। संगठन का कहना है कि गरबा पंडालों में “भाईजानों” यानी मुस्लिम युवाओं की एंट्री पर रोक लगाई जानी चाहिए।

संगठन का तर्क और मांगें

संस्कृति बचाओ मंच के प्रमुख चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि पिछले कुछ सालों में गरबा महोत्सव का माहौल बिगाड़ने की कोशिशें हुई हैं। कई बार देखा गया है कि अन्य धर्म के लोग तिलक या कलावा बांधकर पंडालों में प्रवेश कर जाते हैं और बाद में वहां विवाद या अनुचित घटनाएं होती हैं। उनका कहना है कि गरबा पूजा का हिस्सा है, इसे केवल धार्मिक श्रद्धालु ही करें।

संगठन ने सुझाव दिया है कि आयोजक पंडालों के बाहर भगवान वराह अवतार की तस्वीर लगाएं और प्रवेश करने से पहले हर व्यक्ति उस तस्वीर के सामने पूजा-अर्चना करे। इसके अलावा, माता भगवती की प्रतिमा या तस्वीर की आरती भी अनिवार्य की जाए। तभी किसी को पंडाल में प्रवेश मिले।

परंपरा बनाम व्यवसाय

गरबा के व्यावसायिक रूप को लेकर भी संगठन ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि कई जगह गरबा सिर्फ टिकट बेचने और पैसा कमाने का जरिया बन गया है। इसमें धार्मिक माहौल के बजाय फिल्मी गानों और डीजे का बोलबाला होता है। संगठन चाहता है कि आयोजक केवल भक्ति गीतों, देवी स्तुति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर ध्यान दें, ताकि नवरात्रि का असली स्वरूप बना रहे।

सामाजिक विवाद और आरोप

यह मुद्दा सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं रहा। इसमें समाज और राजनीति का तड़का भी लग गया है। कुछ संगठनों का कहना है कि “नो एंट्री” जैसी घोषणाएं धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकार देता है, ऐसे में किसी खास समुदाय को पंडालों से दूर रखने की मांग विवादास्पद मानी जा रही है।

वहीं, समर्थकों का तर्क है कि गरबा पूजा का अंग है, और इसमें वही लोग शामिल हों जो श्रद्धा और आस्था से आएं। उनका आरोप है कि कई जगह मुस्लिम युवक गलत नीयत से गरबा पंडालों में घुसते हैं और युवतियों को परेशान करते हैं। ऐसे मामलों को रोकने के लिए यह कदम जरूरी है।

प्रशासन का रुख

अभी तक जिला प्रशासन या पुलिस की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। प्रशासन की भूमिका इसलिए अहम है क्योंकि हर साल भोपाल समेत पूरे प्रदेश में हजारों पंडाल लगते हैं और लाखों लोग गरबा में शामिल होते हैं। अगर प्रवेश को लेकर भेदभावपूर्ण शर्तें रखी गईं तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।

जनता की राय

इस मुद्दे पर लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग इसे आस्था से जोड़ते हैं और कहते हैं कि धार्मिक आयोजन में अनुशासन और पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना है कि अगर पूजा-पाठ की शर्त रखी जा रही है तो इसमें गलत क्या है?

दूसरी ओर, कई लोग इसे सांप्रदायिक विभाजन का तरीका मानते हैं। उनका कहना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और किसी को भी धार्मिक आयोजन देखने या उसमें शामिल होने से रोका नहीं जा सकता। गरबा केवल पूजा ही नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक है।

राजनीति की आहट

गरबा पंडालों में प्रवेश का यह विवाद चुनावी मौसम में राजनीतिक रंग भी ले सकता है। अलग-अलग पार्टियां इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिश कर सकती हैं। एक पक्ष इसे हिंदू संस्कृति की रक्षा बताएगा, तो दूसरा पक्ष इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास कहेगा।

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निष्कर्ष

भोपाल के गरबा पंडालों में “भाईजानों को नो एंट्री” का मुद्दा नवरात्रि के पहले ही गरम हो गया है। एक ओर धार्मिक संगठन हैं जो आस्था और सुरक्षा का हवाला देकर यह मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संविधान और समानता की बात करने वाले लोग हैं जो इसे भेदभाव मानते हैं। प्रशासन की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है कि आखिर इस विवाद को कैसे सुलझाया जाएगा।

गरबा, जो मूल रूप से शक्ति उपासना और सामूहिक आनंद का प्रतीक है, अब धार्मिक और राजनीतिक बहस का मैदान बनता दिख रहा है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या सचमुच पंडालों में पूजा कर प्रवेश की शर्त लागू होती है या फिर प्रशासन इसे केवल बयानबाजी मानकर अनदेखा कर देता है।

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