मथुरा। समाज में नशे की लत को लेकर अक्सर चर्चाएँ होती रहती हैं। युवाओं को सिगरेट, शराब और अन्य नशों से दूर रखने के लिए समय-समय पर अभियान भी चलाए जाते हैं। इसी कड़ी में कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज (Aniruddhacharya) का एक कार्यक्रम इन दिनों सुर्खियों में है। वजह बनी एक अनोखी घटना—प्रवचन के दौरान कुछ युवा जो नशे की गिरफ्त में थे, वे महाराज के पास पहुँचे और सवाल करने लगे। उनमें से एक ने पूछा—“क्या सिगरेट अपने आप मुंह में घुस जाती है?”

यह सवाल सुनकर सभा में मौजूद लोग पहले चौंक गए, फिर मुस्कुराने लगे। लेकिन, अनिरुद्धाचार्य ने इसे हल्के में नहीं लिया। उन्होंने इस मौके को युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश देने का साधन बना दिया।


घटना का सिलसिला

जानकारी के अनुसार, मथुरा में आयोजित कथा कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे। अनिरुद्धाचार्य अपने विशेष अंदाज़ में प्रवचन दे रहे थे, तभी कुछ युवा वहाँ पहुँच गए। इन युवाओं के हाव-भाव से साफ झलक रहा था कि वे नशे के आदी हैं।

सभा के बीच जब एक युवक ने चुटकी लेते हुए सवाल किया, “क्या सिगरेट अपने आप मुंह में आकर लग जाती है?”, तो लोगों ने इसे मज़ाक समझा। लेकिन इस सवाल के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी थी—नशा ऐसा है जो पहले मज़ाक-मज़ाक में शुरू होता है और धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाता है।


अनिरुद्धाचार्य का जवाब

अनिरुद्धाचार्य ने गंभीर स्वर में कहा,
“बेटा, सिगरेट अपने आप मुंह में नहीं जाती, उसे इंसान खुद उठाता है। लेकिन एक बार जब आदत बन जाती है, तो इंसान मजबूर हो जाता है। उस वक्त लगता है जैसे ये आदत अपने आप चल रही हो। यही भ्रम है, यही असली खतरा है।”

उन्होंने आगे युवाओं से कहा कि नशा सिर्फ स्वास्थ्य को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को बर्बाद करता है। यह सोच कि ‘मेरे बस में है, मैं कभी भी छोड़ दूँगा’, सबसे बड़ी भूल है।


नशे के दुष्परिणाम

भारत जैसे देश में जहाँ युवा आबादी सबसे अधिक है, वहाँ नशे की समस्या समाज के लिए गंभीर चुनौती है।

  • हर साल लाखों लोग तंबाकू और सिगरेट से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित होते हैं।
  • WHO की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में 80 लाख से अधिक मौतें सिर्फ तंबाकू से होती हैं।
  • भारत में शराब और ड्रग्स से जुड़ी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं, जिनका असर सीधे परिवार और समाज पर पड़ता है।

युवाओं के बीच “कूल दिखने” या “दोस्तों के दबाव” में सिगरेट और नशे की शुरुआत होती है। धीरे-धीरे यह लत शरीर और दिमाग पर कब्जा जमा लेती है।


सामाजिक दृष्टिकोण

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी चर्चा तेज हो गई। कुछ लोगों ने युवक के सवाल को हास्यास्पद बताया, तो कईयों ने इसे आज के युवाओं की सोच का आईना माना।

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों में नशे से पीड़ित युवाओं को सीधे जोड़ा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ प्रवचन या भाषण से बदलाव नहीं आता, जब तक युवाओं को लगता नहीं कि सामने वाला उनकी समस्या समझ रहा है।


अनिरुद्धाचार्य का संदेश

महाराज ने अपने प्रवचन में यह भी कहा कि नशा सिर्फ शरीर को ही नहीं, आत्मा को भी दूषित करता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा—
“नशे का आदी इंसान धीरे-धीरे अपनी इच्छाशक्ति खो देता है। पहले वह सोचता है कि बस आज के बाद नहीं करूंगा। लेकिन अगले ही दिन वही चीज़ उसके सामने आ जाती है और वह हार मान लेता है। यही हार उसे और गहरे गड्ढे में धकेल देती है।”


सरकार और समाज की भूमिका

सरकारी स्तर पर भी नशा मुक्ति अभियान चलाए जा रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों में अवेयरनेस कैंप लगाए जाते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सिर्फ सरकारी नीतियों से काम नहीं चलता। परिवार, मोहल्ला और दोस्त—सभी को मिलकर इस समस्या से लड़ना होगा।

अगर किसी घर का सदस्य नशे का शिकार है तो बाकी लोग उसे ताने देने की बजाय मदद का हाथ बढ़ाएँ। नशा छोड़ने वाले व्यक्ति को सहारा देना परिवार की जिम्मेदारी है।


निष्कर्ष

“क्या सिगरेट अपने आप मुंह में घुस जाती है?”—यह सवाल भले ही हल्का या व्यंग्यपूर्ण लगे, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई बहुत गहरी है। नशा अपने आप नहीं आता, उसे इंसान खुद अपनाता है। फर्क बस इतना है कि शुरुआत में यह ‘मज़ाक’ लगता है, और बाद में मजबूरी बन जाता है।

अनिरुद्धाचार्य महाराज ने सही समय पर इस सवाल को गंभीरता से लेते हुए युवाओं को संदेश दिया कि नशा किसी भी रूप में जीवन के लिए घातक है। आज ज़रूरत है कि समाज इस संदेश को सिर्फ सुनकर न छोड़े, बल्कि इसे अमल में भी लाए।

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