मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर में एक बार फिर से शहर के विकास से जुड़ा बड़ा फैसला होने जा रहा है। नगर निगम की महापौर परिषद की बैठक में कल दो अहम मुद्दों पर चर्चा होगी — पहला, बीआरटीएस (बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) कॉरिडोर (BRTS) को तोड़ने का निर्णय, और दूसरा, सराफा चौपाटी के स्वरूप में बदलाव। (बीआरटीएस तोड़ने और सराफा चौपाटी) दोनों ही विषय सीधे तौर पर आम नागरिकों से जुड़े हैं, इसलिए शहरवासियों की निगाहें कल होने वाली बैठक पर टिकी हुई हैं।


बीआरटीएस कॉरिडोर पर विवाद: सुविधा या सिरदर्द?

इंदौर में लगभग एक दशक पहले जनता की सुविधा और ट्रैफिक नियंत्रण के नाम पर बीआरटीएस कॉरिडोर का निर्माण किया गया था। इसे शहर का आधुनिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम बताकर पेश किया गया था, लेकिन हकीकत में इसके कारण कई जगह ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं की स्थिति बनी।

राजीव गांधी प्रतिमा से लेकर निरंजनपुर तक का हिस्सा सबसे ज्यादा विवादों में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस कॉरिडोर के कारण चौड़ी सड़क संकरी हो गई और दोपहिया तथा चारपहिया वाहनों के लिए परेशानी बढ़ गई। कई बार सवाल उठे कि जब बीआरटीएस का पर्याप्त उपयोग ही नहीं हो रहा, तो इसे बनाए रखना जनता के पैसे की बर्बादी है।

नगर निगम के सूत्रों के मुताबिक, यदि परिषद मंजूरी देती है तो टेंडर जारी कर कॉरिडोर को हटाने का काम दशहरे के आसपास शुरू किया जा सकता है।


सराफा चौपाटी: स्वाद की पहचान, अब विवाद का कारण

इंदौर का सराफा सिर्फ सोने-चांदी की दुकानों के लिए ही मशहूर नहीं, बल्कि रात के समय लगने वाली चौपाटी के लिए भी जाना जाता है। यहाँ मिलने वाले व्यंजन देशभर में प्रसिद्ध हैं — चाहे गराड़ू हो, जोशी की दही-बड़ा हो या फिर मालपुआ। लेकिन बीते कुछ समय से चौपाटी के स्वरूप को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

शहरवासियों का आरोप है कि चौपाटी में ज़्यादा जंक फूड और चाइनीज़ आइटम बिकने लगे हैं, जिससे इंदौर की पारंपरिक पहचान धुंधली हो रही है। इसके अलावा, भीड़ और अव्यवस्था के कारण सुरक्षा और सफाई की समस्या भी सामने आई है।

इन्हीं कारणों से नगर निगम इस चौपाटी को नए स्वरूप में ढालने की योजना बना रहा है। चर्चा है कि यहाँ से जंक और चाइनीज़ फूड की दुकानों को हटाकर केवल पारंपरिक भारतीय व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाएगा।


बनेगी संयुक्त कमेटी, शामिल होंगे व्यापारी और प्रशासन

सराफा चौपाटी को व्यवस्थित करने के लिए निगम ने पहले ही फैसला लिया है कि एक संयुक्त कमेटी बनाई जाएगी। इसमें सराफा बाजार के व्यापारी, चौपाटी संचालक, नगर निगम अधिकारी और पुलिस विभाग के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

इस कमेटी का काम होगा — चौपाटी की दुकानों को नियमानुसार व्यवस्थित करना, सुरक्षा इंतजाम बढ़ाना और सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करना। इसके अलावा, खाने-पीने के आइटम्स के क्वालिटी चेक पर भी ध्यान दिया जाएगा।


जनता की राय: समर्थन और विरोध दोनों

इन दोनों मुद्दों पर जनता की राय बंटी हुई है।

  • बीआरटीएस हटाने पर कुछ लोग इसे सही बता रहे हैं क्योंकि इससे ट्रैफिक सुगम होगा और दुर्घटनाएं कम होंगी। वहीं, कुछ नागरिकों का कहना है कि जिस योजना पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, उसे तोड़ना जनता के पैसों की बर्बादी है।
  • सराफा चौपाटी पर बदलाव को लेकर भी राय बंटी हुई है। कुछ लोग पारंपरिक व्यंजनों को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं, तो वहीं नौजवान कहते हैं कि फूड कल्चर में विविधता भी जरूरी है।

राजनीतिक पुट भी जुड़ा

इंदौर नगर निगम की बैठक सिर्फ प्रशासनिक फैसला भर नहीं, बल्कि राजनीतिक रंग भी लिए हुए है। महापौर और परिषद पर जनता की नजर है कि वे किस पक्ष में फैसला करते हैं। विपक्षी दलों ने पहले ही आरोप लगाया है कि निगम जनता की गाढ़ी कमाई से बनी योजनाओं को बिना ठोस कारण खत्म करने जा रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष का दावा है कि जनता की मांग और सुविधा के हिसाब से फैसले लिए जाएंगे।


आगे क्या?

आज की बैठक में जो भी निर्णय होगा, उसका सीधा असर शहर के लाखों लोगों पर पड़ेगा।

  • अगर बीआरटीएस कॉरिडोर हटता है तो दशहरे के आसपास तोड़फोड़ और निर्माण का काम शुरू हो जाएगा, जिससे कुछ समय के लिए ट्रैफिक और भी प्रभावित होगा।
  • सराफा चौपाटी के नए स्वरूप का असर सीधे तौर पर छोटे दुकानदारों की रोज़ी-रोटी पर पड़ेगा।

निष्कर्ष

इंदौर के लोग शहर की पहचान को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। बीआरटीएस कॉरिडोर हटाने का मुद्दा हो या सराफा चौपाटी की व्यवस्था — दोनों ही फैसले इंदौर के भविष्य को सीधे प्रभावित करेंगे। अब देखना यह है कि नगर निगम जनता की भावनाओं और व्यावहारिक जरूरतों के बीच कैसा संतुलन बनाता है। 26 तारीख का दिन इंदौर के विकास और पहचान के लिहाज से बेहद अहम साबित हो सकता है।


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