🟡 Quick Highlights
- केंद्र सरकार ने चिनाब नदी पर 1,856 मेगावाट की सावलकोट जलविद्युत परियोजना को दी हरी झंडी
- जम्मू-कश्मीर में बन रहा यह अब तक का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट होगा
- पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद निर्माण कार्य जल्द शुरू होने की संभावना
- पाकिस्तान के विरोध के बावजूद भारत का आत्मनिर्भर जल नीति की ओर मजबूत कदम
- सिंधु जल संधि निलंबित होने के बाद यह भारत की नई रणनीतिक नीति का हिस्सा माना जा रहा है
📰 विस्तृत खबर
भारत सरकार ने चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट जलविद्युत परियोजना (Sawalkot Hydroelectric Project) को अंतिम मंजूरी दे दी है। यह परियोजना जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में चिनाब नदी पर बनाई जाएगी और इससे करीब 1,856 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट को नेशनल हाइड्रोपावर कॉरपोरेशन (NHPC) द्वारा विकसित किया जाएगा।
यह परियोजना पिछले लगभग दो दशकों से अटकी हुई थी, लेकिन अब केंद्र सरकार ने इसे “राष्ट्रीय महत्व की परियोजना” घोषित करते हुए इसकी पर्यावरणीय और प्रशासनिक मंजूरी प्रदान की है।
इस मंजूरी के साथ ही भारत ने पाकिस्तान को एक और स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपनी नदियों पर संप्रभु अधिकार का पूरा इस्तेमाल करेगा।
⚙️ क्यों है सावलकोट प्रोजेक्ट खास
सावलकोट प्रोजेक्ट चिनाब नदी पर बनने वाला सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्लांट होगा।
इससे लगभग 8,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आएगा और स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा।
प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में बिजली की कमी को खत्म करना और राष्ट्रीय ग्रिड में स्वच्छ ऊर्जा का योगदान बढ़ाना है।
चिनाब नदी, जो सिंधु नदी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है, उस पर भारत ने पहले भी बगलिहार, रतले और पाकल दुल जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।
सावलकोट के पूरा होने पर भारत की कुल हाइड्रोपावर क्षमता में बड़ा उछाल आएगा और यह परियोजना ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है।
🌊 सिंधु जल संधि का निलंबन और नई नीति
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) के तहत छह नदियों – सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलज – का जल विभाजन किया गया था।
इस समझौते में चिनाब नदी का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में गया था, जबकि भारत को सीमित उपयोग की अनुमति थी।
लेकिन, अप्रैल 2025 में भारत ने पाकिस्तान की लगातार शत्रुतापूर्ण गतिविधियों और आतंकवाद के समर्थन को देखते हुए इस संधि को “निलंबित (suspended)” करने का निर्णय लिया था।
इसका मतलब यह है कि भारत अब इस संधि के प्रावधानों से बंधा नहीं है और अपने जल संसाधनों का उपयोग अपने हित में कर सकता है।
अब सावलकोट प्रोजेक्ट को मंजूरी उसी नीति का हिस्सा मानी जा रही है।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ भारत की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।
हालांकि, पाकिस्तान ने इस निर्णय पर आपत्ति जताते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिकायत की है, लेकिन भारत ने साफ कहा है कि यह उसका संप्रभु निर्णय (sovereign decision) है।
🧩 स्थानीय लोगों को मिलेगा फायदा
सावलकोट प्रोजेक्ट से रियासी और आसपास के इलाकों में रोजगार की नई संभावनाएँ खुलेंगी।
NHPC के अनुसार, निर्माण चरण में करीब 10,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे।
साथ ही, परियोजना पूरी होने पर स्थानीय लोगों को सस्ती बिजली और बुनियादी सुविधाएँ मिलेंगी।
सरकार ने वादा किया है कि पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए इको-फ्रेंडली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा और प्रभावित परिवारों का उचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाएगा।
🧭 भारत की दीर्घकालिक रणनीति
सिंधु जल संधि के निलंबन और सावलकोट प्रोजेक्ट की मंजूरी को मिलाकर देखा जाए तो यह भारत की दीर्घकालिक “वॉटर पॉलिसी स्ट्रेटेजी” का हिस्सा है।
भारत अब अपने हिस्से के पानी को रोककर घरेलू सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल करेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में भारत चिनाब, झेलम और सिंधु की सहायक नदियों पर कई और प्रोजेक्ट ला सकता है।
✅ निष्कर्ष
भारत सरकार का सावलकोट प्रोजेक्ट को मंजूरी देना न केवल एक तकनीकी निर्णय है, बल्कि यह एक रणनीतिक संदेश भी है।
यह दिखाता है कि भारत अब अपने जल संसाधनों को लेकर किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुकेगा।
जम्मू-कश्मीर में यह प्रोजेक्ट ऊर्जा विकास, रोजगार सृजन और पर्यावरणीय संतुलन के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।
साथ ही, सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद यह कदम भारत की नई जल-नीति (New Water Policy) का व्यावहारिक रूप है — जिसमें “अपना जल, अपने लिए” की भावना स्पष्ट झलकती है।

