🔹 Quick Highlights

  • Perplexity के CEO अरविंद श्रीनिवास (Aravind Srinivas) ने कहा कि इंटरनेट को अब सिर्फ गूगल के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
  • उन्होंने कहा कि गूगल इंटरनेट का गेटकीपर बन चुका है, जिससे नवाचार (Innovation) रुक रहा है।
  • Perplexity ने लॉन्च किया है अपना नया AI-based ब्राउज़र “Comet”, जो Chrome को सीधी चुनौती देगा।
  • श्रीनिवास का दावा है कि Comet एक ऐसा ब्राउज़र है जो “यूज़र के सोचने के तरीके” को समझेगा।
  • हालांकि, Comet खुद उसी Chromium इंजन पर आधारित है, जिस पर गूगल का Chrome चलता है।

📄 विस्तृत विवरण

🔸 गूगल पर सीधा हमला

Perplexity के CEO अरविंद श्रीनिवास ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि “The Internet is too important to be left in Google’s hands.” यानी, इंटरनेट इतना अहम है कि इसे किसी एक कंपनी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
उनका इशारा साफ था — Google ने इंटरनेट पर एकाधिकार (monopoly) जैसा माहौल बना लिया है। सर्च इंजन से लेकर ब्राउज़र, विज्ञापन और डेटा कलेक्शन — हर जगह गूगल की पकड़ गहरी है।

श्रीनिवास के मुताबिक, इस एकाधिकार से यूज़र्स के पास विकल्प (choices) कम रह गए हैं और छोटी-छोटी कंपनियों को इनोवेट करने का मौका नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि गूगल की dominance अब सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि खतरा बन चुकी है।


🔸 नया AI ब्राउज़र ‘Comet’

इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए Perplexity ने लॉन्च किया है Comet Browser, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस है।
इस ब्राउज़र की खासियत यह है कि यह सिर्फ वेबसाइट नहीं दिखाता, बल्कि यूज़र के सवाल को समझकर उसका सारांश और बेहतर जवाब देता है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई सर्च क्वेरी पूछी जाती है, तो यह केवल लिंक नहीं, बल्कि पूरा context-based जवाब देता है।

श्रीनिवास का कहना है कि आने वाले समय में सर्च का मतलब “लिंक खोजना” नहीं बल्कि “उत्तर खोजना” होगा — और यही काम Comet करेगा।


🔸 गूगल की ताकत को चुनौती आसान नहीं

हालांकि, यहाँ एक दिलचस्प मोड़ है। Comet ब्राउज़र भी उसी Chromium इंजन पर बना है, जिसे गूगल ने ही ओपन-सोर्स किया था। यानी, जो इंजन गूगल ने बनाया, उसी पर गूगल को चुनौती दी जा रही है।
इस पर सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने तंज कसा कि “गूगल के इंजन पर सवार होकर, गूगल को हराने निकले हैं श्रीनिवास!

इसके बावजूद, श्रीनिवास का कहना है कि गूगल की पकड़ तोड़ने की शुरुआत किसी को करनी ही होगी। उन्होंने कहा कि यूज़र को फिर से इंटरनेट पर नियंत्रण देना जरूरी है, क्योंकि आज सर्च रिजल्ट से लेकर डेटा-यूज़ तक सब कुछ गूगल तय करता है।


🔸 इंटरनेट का भविष्य कौन तय करेगा?

श्रीनिवास का यह बयान उस समय आया है जब दुनिया भर में AI सर्च इंजन तेजी से बढ़ रहे हैं — जैसे ChatGPT, Gemini, Perplexity आदि।
AI-आधारित सर्च की वजह से लोग अब “क्लिक” नहीं बल्कि “उत्तर” चाहते हैं, और यही मॉडल गूगल की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
अगर Perplexity का Comet सफल होता है, तो यह Chrome और Google Search दोनों के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।

लेकिन फिलहाल गूगल की पकड़ बहुत मजबूत है। उसके पास अरबों यूज़र, यूट्यूब, एंड्रॉइड, जीमेल और मैप्स जैसी ताकतें हैं, जो किसी नए ब्राउज़र के लिए रास्ता आसान नहीं बनातीं।


🔸 क्या यूज़र को मिलेगा फायदा?

अगर नए ब्राउज़र सच में बेहतर और पारदर्शी विकल्प बनाते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा आम यूज़र को होगा।
AI-आधारित Comet जैसे ब्राउज़र अगर सफल होते हैं, तो सर्च रिजल्ट और ब्राउज़िंग अनुभव दोनों ही ज्यादा personalized, fast और unbiased हो सकते हैं।
लेकिन साथ ही, डेटा-प्राइवेसी और सुरक्षा जैसे सवाल फिर से सामने आएंगे — कि क्या नया ब्राउज़र भी वही पुरानी गलतियाँ दोहराएगा?


🔚 निष्कर्ष

अरविंद श्रीनिवास ने जो बात कही — “गूगल के भरोसे इंटरनेट नहीं छोड़ा जा सकता” — वह केवल एक बयान नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में चल रही power shift का संकेत है।
Perplexity का Comet भले ही नया है, लेकिन इसका संदेश साफ है — इंटरनेट का भविष्य सिर्फ एक कंपनी नहीं तय कर सकती।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या Comet वाकई यूज़र्स को “Google-मुक्त अनुभव” दे पाएगा या यह भी उसी इकोसिस्टम का हिस्सा बनकर रह जाएगा।

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