🗞️ Quick Highlights
- चुनाव आयोग ने Special Intensive Revision (SIR) की दूसरी फेज़ की शुरुआत की है।
- लगभग 51 करोड़ मतदाताओं की सूची की जांच और सुधार किया जाएगा।
- मृत, दोहरी एंट्री या प्रवासी नामों को हटाने और नए मतदाताओं को जोड़ने पर ज़ोर।
- विपक्ष ने इस प्रक्रिया पर निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
- आयोग ने कहा — “सभी पार्टियां हमारे लिए समान हैं।”
- 4 दिसंबर तक घर-घर सत्यापन का अभियान चलेगा, ड्राफ्ट सूची 9 दिसंबर को जारी होगी।
🧩 SIR प्रक्रिया क्या है?
SIR यानी Special Intensive Revision दरअसल मतदाता सूची का एक गहन पुनरीक्षण अभियान है। इसमें बूथ स्तर पर जाकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल न हो और कोई योग्य नागरिक इससे वंचित भी न रहे।
इस प्रक्रिया के तहत:
- मृत व्यक्तियों, दोहरी पंजीकरण वाले या स्थानांतरित लोगों के नाम हटाए जाएंगे।
- 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के नए मतदाताओं को जोड़ा जाएगा।
- सूची में नाम, पता, उम्र या लिंग संबंधी गलतियों को सुधारा जाएगा।
इस बार SIR की दूसरी फेज़ 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चलाई जा रही है, जिनमें मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य शामिल हैं।
🗳️ क्यों ज़रूरी है SIR प्रक्रिया?
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची की सटीकता बेहद जरूरी है। हर साल लाखों लोग प्रवास करते हैं, स्थान बदलते हैं, या नए मतदाता बनते हैं। ऐसे में सूची को अपडेट रखना चुनावी पारदर्शिता की रीढ़ है।
1. चुनावी विश्वसनीयता बढ़ाना:
सटीक मतदाता सूची चुनाव की निष्पक्षता की गारंटी देती है। इससे फर्जी मतदान और दोहरी वोटिंग जैसी गड़बड़ियों पर रोक लगती है।
2. नए मतदाताओं को जोड़ना:
18 साल के होने वाले युवाओं के लिए यह मौका है कि वे लोकतंत्र की प्रक्रिया में आधिकारिक रूप से शामिल हो सकें।
3. गलतियों का सुधार:
कई बार नाम की स्पेलिंग या पता गलत छप जाता है — SIR इन त्रुटियों को ठीक करने का सबसे बेहतर अवसर है।
4. भविष्य के चुनावों की तैयारी:
2025–26 में कई राज्यों में विधानसभा और लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में ये अभियान उनकी तैयारी की दिशा में एक अहम कदम है।
⚖️ विवाद और चुनौतियाँ
जहाँ SIR प्रक्रिया को एक सकारात्मक पहल बताया जा रहा है, वहीं इस पर राजनीति भी गर्म हो गई है।
विपक्ष का आरोप:
कुछ राजनीतिक दलों ने इसे “वोटर छंटनी” का अभियान बताया है। उनका कहना है कि इससे खास वर्गों या अल्पसंख्यक समुदायों के नाम जानबूझकर हटाए जा सकते हैं।
ECI का जवाब:
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उसका कहना है कि SIR पूरी तरह पारदर्शी और तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें सभी पार्टियों को समान अवसर दिया गया है।
ग्रामीण इलाकों की मुश्किलें:
गाँवों में दस्तावेज़ों की कमी या फॉर्म भरने में दिक्कत आने की आशंका है। कई मतदाताओं को अब भी जानकारी नहीं है कि अगर नाम सूची में नहीं है तो क्या करना चाहिए।
📍 इंदौर और मध्यप्रदेश के लिए इसका मतलब
मध्यप्रदेश में BLOs (Booth Level Officers) घर-घर जाकर सत्यापन कर रहे हैं। इंदौर जैसे शहरी इलाकों में यह काम तेजी से चल रहा है। यहाँ डिजिटल साधनों की मदद से फॉर्म भरे जा रहे हैं और नए मतदाताओं के आवेदन ऑनलाइन लिए जा रहे हैं।
आप जैसे नागरिकों के लिए यह ज़रूरी है कि एक बार NVSP या Voter Helpline App पर जाकर देखें कि आपका नाम सूची में मौजूद है या नहीं। अगर नहीं है, तो ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
🔍 क्या हैं प्रमुख चुनौतियाँ?
- दस्तावेज़ों की कमी: हर मतदाता के पास जन्म प्रमाणपत्र या निवास प्रमाणपत्र नहीं होता।
- समय सीमा: 4 दिसंबर तक घर-घर अभियान पूरा करना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
- डुप्लीकेट हटाना: दोहरी प्रविष्टियों को हटाना और साथ में नए नाम जोड़ना आसान काम नहीं।
- विश्वसनीयता बनाए रखना: अगर कहीं गड़बड़ी हुई, तो मतदाता आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकते हैं।
🧠 निष्कर्ष
SIR मतदाता सूची सुधार सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। अगर यह पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू होती है, तो चुनावों की साख और मतदाता का भरोसा दोनों बढ़ेंगे।
चुनाव आयोग की यह पहल तभी सफल होगी जब आम नागरिक भी इसमें सहयोग दें — अपने दस्तावेज़ अपडेट रखें, नाम सत्यापित करें और नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए दूसरों को प्रेरित करें।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत “मतदाता” है, और SIR यही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि हर सही नागरिक का नाम सही सूची में हो।

